रोग की चिकित्सा करने के बजाय रोग को न होने देना ही अधिक श्रेयस्कर होता है और यह चर्याचर्य अर्थात् ऋतुचर्या दिनचर्या तथा रात्रिचर्या के सम्यक् परिपालन से रोग का
‘लकीर-पिटेणी’ मात्र कहानी का ही शीर्षक नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का उद्गार भी है, जो अपने समय का महान कर्मकाण्डी और ज्योतिषी था। बात बहुत पुरानी है। तब मैं