अपनी सरकारों की चुस्त कार्यप्रणाली को देख कर एक विज्ञापन की याद आ जाती है, जिसमें बिस्किट के स्वाद में
एक तुम,मेरे प्राणों में क्या जगी,टूट गए अवरोध सारे। बह गया भेद मजधार और किनारों का,डूब गया अन्तर रोशनी के
सच बोलें तो दुनिया रूठे, झूठ कहें तो राम,सतपथ के अनुगामी का यहाँ जीना हुआ हराम। सच बोलें तो दुनिया
माना कि जीवन जटिल रहस्यों की गुत्थी है, कभी कठिन तो कभी सरल, लेकिन कल्पना मात्र के लिए इसे दूर
वर्तमान समय में जबकि मनुष्य भौतिकवाद की अन्धी दौड़ में बिना लक्ष्य के भटक रहा है, ऐसे में मनुष्य का
किताबों के पन्नों में कविताएंजैसे दबा हो किताबों के बीच एक फूल,किसी के लिए नहीं उसकी सुगन्ध,उसके सौंदर्य का कोई