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वीं रात

घाम अछे गे छौ। जनि-जनि दिन ढलदु गै अर ब्यखुनि कि कुरबुरि छाण बैठि, थकान से चूर जगदम्बा कि चिन्ता वि बढदु गै। अबि क्षणि कतगा दूर च थीं ढकरि

सच बोलें तो दुनिया रूठे

सच बोलें तो दुनिया रूठे, झूठ कहें तो राम,सतपथ के अनुगामी का यहाँ जीना हुआ हराम। सच बोलें तो दुनिया कहती यह अनपढ़, पागल है,झूठ कहें तो दिल कहता है

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