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Wednesday, May 25, 2022
ज्योतिष हृदय अनुभूति व भावना का प्रतीक गृह ‘चन्द्र’

हृदय अनुभूति व भावना का प्रतीक गृह ‘चन्द्र’

यमुनातीरोद्भव आत्रेय गोत्र सोम (चन्द्र) महर्षि अत्रि और साध्वी अनुसूया देवी की तृतीय संतति हैं। एक समय त्रिदेवों (विष्णु, शिव और ब्रह्मा) ने साध्वी अनुसूया की कोख से महर्षि अत्रि के घर पुत्रों के रूप में अवतार लेने का वचन दिया था। इसी वचनबद्धता के कारण तीनों ने जन्म धारण किया। विष्णु ने दत्तात्रेय के रूप में, शिव ने दुर्वासा के रूप में और ब्रह्मा ने सोम (चन्द्र) के रूप में अवतार लिया। आद्य पुरुष मनु की द्वितीय पुत्री देवहूति चन्द्र की मातामही (नानी) और कर्दम मातामह (नाना) हैं। बृहस्पति (गुरु) चन्द्र के मामा हैं। चन्द्र के पितृवर ब्रह्मपुत्र अत्रि का आश्रम यमुना के किनारे चित्रकूट (प्रयाग) में था।

समुद्र मंथन से चन्द्रमा के एक अंश का प्रादुर्भाव हुआ था जो शिवजी की जटा में विराजमान है। चन्द्र को समुद्र पुत्र एवं लक्ष्मी सहोदर भी कहते हैं।

चन्द्र की उत्पत्ति वर्षा ऋतु, भाद्रप्रद मास के एक सोमवार को हुई। चन्द्रमा की उत्पत्ति से समय की जन्म कुंडली निम्नांकित है।

जब चन्द्र का अवतरण हुआ तो ब्रह्मचक्र त्वरित गति में विशिष्ट स्थिति में गतिशील था। कर्क लग्न की सुखद जलीय वेला थी। स्वगृही सूर्य देव धन भाव में होकर वर्षा ऋतु का संचालन कर रहे थे। सुरवेश शुक्र चतुर्थ भाव में होकर राज्य भाव को सुरक्षित किए हुए था। पराक्रम फल बुध भी स्वगृह में था। धनु का प्रबल केतु षष्ठ भाव में वक्ररूढ़ था। तटस्थ शनि सप्तम भाव में स्वगृही होकर पौरुष क्षय के साथ सुख हावी था। भाग्य भाव में स्वगृही देवगुरु चन्द्र को सौम्यता, सुन्दरता एवं आकर्षण शक्ति प्रदान कर रहे थे। राज्यंश मंगल भी राज्यस्थित होकर सुखक्षय को उद्यत था। इन्हीं की कृपा से चन्द्र के मुखमण्डल पर नन्हें-नन्हें धब्बे हुए। व्यय भावस्थ राहु अपने स्वभाव के अनुसार लालायित होकर चन्द्र के अद्वितीय सुन्दर देह को ग्रसित करने को तत्परता से उद्यत था। चन्द्र की जन्मकालीन स्थिति सर्वांगीण रूप में विचित्रता लिए थी। यही प्रधान कारण है कि पाश्चात्य ज्योतिर्विद चन्द्र को स्त्रीरूपक मानकर देवी रूप में प्रतिष्ठा देते हैं जबकि भारतीय पौराणिक शास्त्रों मे चन्द्र को ‘चन्द्रवंश’ का प्रवर्तक मानकर लोक प्रतिष्ठित किया गया है। यह पुरुषों में पुरुष और नारियों में नारी भी माना गया है। लोग चन्द्र को ग्रहराज आदित्य की रानी भी कहते हैं।

यही चन्द्र कालपुरुष का हृदय, पेट, गुर्दा है। गले से हृदय तक के क्षेत्र गर्भ, अण्डकोष आदि पर चन्द्र का प्रभाव रहता है। चन्द्र स्त्री व पिंगला नाड़ी का प्रतीक है। यह सर्वाधिक गतिमान मन का कारक है। इसीलिए वेदों में चन्द्र को ‘चन्द्रमा मनसो जातः’ कहकर मन का प्रतीक कहा है। भारतीय दैवज्ञों व ज्योतिषियों ने चन्द्रमा के आधार पर चान्द्र वर्षों का प्रचलन करके तिथि, मास, नक्षत्रों का सीमांकन करते हुए गणना के मान स्थापित किए हैं। चन्द्र स्थिति के अनुसार चन्द्रकुण्डली बनाकर ज्योतिषी भविष्य का मूल्यांकन करते हैं। फलित अनुभाग पर चन्द्रमा का  आधिपत्य है। मुहूर्त शास्त्र में चन्द्र की प्रधानता है। चन्द्रमा पृथ्वी का छोटा भाई है। अतः लोग चन्द्रमा को ‘चन्दा मामा’ कहते हैं। चन्द्रमा पृथ्वी का एक  मात्र उपग्रह है।

चन्द्रमा जब सूर्य स्थित राशि में समान अंशों पर होता है तो अमावस्या होती है। इसी प्रकार 6 राशि दूरी अंशों पर होने से पूर्णिमा होती है। अमावस्या को चन्द्र अस्त हो जाता हे तथा पूर्णिमा को पृथ्वी पर पूर्ण होकर प्रकाश देता है। समुद्र में ज्वार-भाटे का कारण चन्द्रमा ही है। स्त्रीत्व पर चन्द्र का सर्वांगीण अधिकार है। स्त्रियों के मासिक धर्म का कारण चन्द्र ही है। चन्द्रमा की कलाओं से पूर्ण प्रभावित होकर ऋतुस्राव होता है। भिन्न-भिन्न स्त्रियों की जन्म कुण्डलियों में विभिन्न भावों पर आरूढ़ होकर चन्द्र अपने बलानुसार विभिन्न कलाओं से ऋतुस्राव देता है। चन्द्रमा का प्रभाव गर्भाशय पर भी रहता है।

चन्द्रमा पश्चिमोत्तर (वायव्य) दिशा का स्वामी होता है। इसके नक्षत्र रोहिणी, अस्त, श्रवण हैं। विंशोतरी दशा चक्र में चन्द्र को 10 वर्ष मिले हैं। यह 2 के मूलांक पर प्रभावी रहता है। इसके दीप्तांश कलांश 11 हैं।

चन्द्र हृदय की कोमल अनुभूति और भावनाओं का प्रतिनिधि है। इसका स्वभाव- शीतल, जलतत्व एवं दृष्टि शुभ है। चन्द्रमा का धातु- चांदी, अन्न- चावल, द्रव- दूध, दही, द्रव्य- मणि, रत्न- मोती, ऋतु- वर्षा, रस- लवणयुक्त, वर्ण- शुभ्र श्वेत, अंग- सुन्दर, नेत्र- गोलाकार, प्रकाशवान एवं सत्वगुण- चंचल स्वभावी स्त्री प्रतीक व्यक्तित्व वाला।

चन्द्रमा स्वयं प्रकाश धारक नहीं है। यह सूर्य से प्रकाश पाकर उसे परावर्तित करता है। चन्द्र का परावर्तित प्रकाश शीतलता के कारण अमृतमय माना जाता है।

चन्द्रमा को कई नामों से सम्बोधन मिला है। जैसे- सोम, इन्दु, विधु, अव्ज, ग्लौ, मृगांक, शशांक, उडपति, राकेश, शशि, शीतांशु, क्षपाकर, कुमुद, अत्रिज, जैव, अब्धिज, हिमकर, शुभ्रांशु आदि।

चन्द्रमा पृथ्वी से लगभग ढाई लाख मील दूर है। यह पृथ्वी का एक चक्कर लगभग एक माह में पूरा करते हुए अपनी धुरी का एक चक्कर 27 1/3 दिनों में पूर्ण कर लेता है। भचक्र में 900 से 1200 तक चन्द्र का क्षेत्र है। चन्द्रमा लगभग बाईस सौ मील प्रतिघंटा की गति से अपने मार्ग पर गतिशील रहता है। सूर्य अपने मार्ग को जो एक माह में पूरा करता है, चन्द्रमा सवा दो दिन में ही पूरा कर लेता है। सूर्य के एक वर्ष के मार्ग को एक माह में, एक पक्ष के मार्ग को एक दिन में पूरा कर लेता है।

प्रत्यक्ष देवता ग्रहराज सूर्य तो चन्द्रमा का अधिष्ठाता है ही क्योंकि सूर्य से ही चन्द्र को प्रकाश मिलता है। मंगल से चन्द्र को नफरत है क्योंकि चन्द्र, मंगल की राशि वृश्चिक पर नीच स्थान पाता है और मंगल भी चन्द्र की स्वराशि कर्क पर नीच स्थान प्राप्त करता है। बुध, चंद का जारज पुत्र है। बृहस्पति-चन्द्र का अपना मामा ही ठहरा, रिश्तेदार, परामर्शदाता। शुक्र सौन्दर्य का वास्तिविक कारक ग्रह है और चन्द्र उसका प्रतीक। तभी चन्द्र को शुक्र की राशि वृष में उच्च स्थान मिला हैं। यही चन्द्र की प्राणप्रिय पत्नी रोहिणी आवासित है। शुक्र, चन्द्र पत्नी रोहिणी का संरक्षक है, उच्चेश है। शनि, राहु, केतु चन्द्र के परम शत्रु हैं। यह 12 राशियों में से केवल एक राशि कर्क का स्वामी है। वृष के 29 अंश पर मूल त्रिकोण होता है।

दक्ष प्रजापति की 60 कन्यायें थी। जिनमें से 29 कन्यायें (आश्विन्यादि रेवती पर्यन्त नक्षत्र) चन्द्रमा को ब्याह दी थी। इन 29 में रोहिणी चन्द्र की परमप्रिया थी। चन्द्र ने रोहिणी को अपने उच्च स्थान में सुरक्षित छोड़ दिया। भगवान कृष्ण के चरित्र को पढ़कर ज्ञात होता है कि उनके जन्म के समय रोहिणी नक्षत्रारूढ़ था। इसी के प्रबल प्रभाव से भगवान कृष्ण में सम्मोहन शक्ति थी। चन्द्र की सभी पत्नियां उसके रोहिणी प्रेम से ईर्ष्यायुक्त हो गई। सभी एक मत होकर अपने पितृवर दक्ष के पास गई और चन्द्र के प्रति शिकायतें की। पिता का हृदय पुत्रियों के उद्वेग से प्रभावित हो गया। अतः उन्होंने चन्द्र को राजयक्ष्मा रोग होने का श्राप दे दिया। चन्द्र दुःखी होकर महादेव शिव के संरक्षण में चला गया। चन्द्र की सभी पत्नियां दुःखी हो गई और पुनः अपने पिता से अनुनय-विनय करके उन्होंने चन्द्र को प्राप्त किया। तभी से चन्द्र प्रत्येक नक्षत्र को प्रतिदिन भोगता है। ब्रह्मा के आशीर्वाद से और शिव की अनुकम्पा से चन्द्र का क्षय रोग नियंत्रित है। वह 15 दिन क्षय पीड़ित रहता है किन्तु पुनः शुक्ल पक्ष में परिपुष्ट होकर पूर्णिमा को स्वस्थ हो जाता है।

स्त्रियां चतुर्थी व पूर्णिमा के व्रत करके चन्द्र के दर्शन करके अर्ध्य प्रस्तुत करने के उपरान्त भोजन ग्रहण करती हैं। स्त्रियां सौभाग्य, सुख, सम्पन्नता की याचना करके चन्द्र को प्रसन्न करती हैं।

जब चन्द्र मेष, सिंह, वृश्चिक का होता है तो उसका रंग लाल एवं हाथी उसका वाहन होता है। वृष, कर्क, तुला राशि का होने पर चन्द्र श्वेत रंग का होता है और बैल उसका वाहन होता है। मिथुन, धनु, मीन राशि का होकर चन्द्र पीत वर्ण का होकर घोड़े को वाहन बनाता है। कन्या, मकर, कुम्भ का होकर चन्द्र का रंग काला व वाहन भैंसा होता है। यह चन्द्र के वाहन व रंग का रहस्य है।

ज्योतिष शास्त्रानुसार वर्ष, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण, दिनमान, रात्रिमान, घटी, पल, विपल, घंटा, मिनट, सेकेंड आदि का मान सूर्य-चन्द्र की स्थितियों के आधार पर आधारित है। मानव जीवन में जन्म से मृत्यु पर्यन्त तक के सभी कार्यकलाप मुहूर्तानुसार इन्हीं सूर्य-चन्द्र की गतियों पर निर्भर करती है।

चन्द्रमा के घटने-बढ़ने की अवस्था के आधार पर शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक शुक्लपक्ष, कृष्ण प्रतिपदा से अमावस्या तक 15-15 दिन का लगभग एक-एक पक्ष होता है। चान्द्र मास, चान्द्र वर्ष तिथियों पर ही निर्धारित हैं।

जड़, चेतन प्राणि मात्र पर चन्द्र का सद्य प्रभाव पड़ता है। स्वगृही चन्द्र शुद्ध चित्त, शीलवान, सम्पत्तिवान, विलासी, काव्य प्रकृति, भ्रमण प्रेमी बनाता है। चन्द्र ऐसे जातकों को उन्मादी व्यक्तित्व, आदर्शवादी, अत्यधिक भावुक, घर-कुटुम्ब को प्यार करने वाला, छिद्रान्वेषी, अन्यमनस्क बनाते हुए स्त्री विशेष के सहयोग से उन्नतिशील बनाता है। उच्चस्थ होकर चन्द्र उदार, धनी, कफ प्रकृति, बहुकन्या संतति, कामनियों को प्रिय, वृद्धावस्था में सुखी, लगन के पक्के एवं महत्वाकांक्षी बनाता है। नीचस्थ चन्द्र चालाक, दुष्टचित्त, कुसंगति, गुप्तथाप कर्मरत, किशोर अवस्था में ही अनैतिक एवं नवीन अनुभवों की लालसा रखने वाला बनाता है। मित्रक्षेत्री होने पर अनुकूल फलदाता और शत्रुक्षेत्री होने पर प्रतिफूल फलदाता बनता है।

डॉ0 कुलदीप चंद्र पंत, हरिद्वार
साहित्य विभागाध्यक्ष | जय भारत साधु महाविद्यालय, हरिद्वार | पी.एच.डी.: ‘श्रीमद् भागवत महापुराण में प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांत’

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