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Thursday, September 29, 2022
ज्योतिष आध्यात्मवाद, हृदयवल बड़प्पन का प्रतीक ग्रह बृहस्पति

आध्यात्मवाद, हृदयवल बड़प्पन का प्रतीक ग्रह बृहस्पति

सिंधुदेशोद्भव आंगीरस गोत्रोत्पन्न भगवन गुरु-महर्षि कर्दम की तृतीय पुत्री श्रद्धा देवी का पुत्र है। इनके पितृवर महर्षि अंगिरा जी हैं। इनका जन्म वृहस्पति है। महानकाय होने के कारण और महान ज्ञानी होने से इन्हें लोग गुरु कहलाने लगे। गुरु शब्द की व्युत्पत्ति का रहस्य है, गु $ रु (अज्ञान $ नाशक)। ये देवमंत्री हैं, विष्णु के उपासक हैं, स्वर्गलोक के दाताभोक्ता हैं। यही गुरुदेव सर्वब्रह्म स्वरूप आदित्य को मंत्रणा देते हैं, धर्म, न्याय, भाग्य, भविष्य, धन, लाभ, प्रजावृद्धि, सुख, सौभाग्यका कार्य संचालन करते हैं। ये ही गुरु वृहस्पति अध्यात्मवाद हृदयबल बड़प्पन के प्रतीक गृह हैं।

लोगों ने गुरु वृहस्पति को कई विभिन्न नामों का सम्बोधन दिया है, यथा- सुरगुरु, जीव, ईज्य, वाचस्पति, अंगिरा, देवेज्य, सुराचार्य, मुश्तरी, जुपीटर, जेड्स आदि। वृहस्पति सूर्यदेव से लगभग साढ़े अड़तालीस करोड़ मील दूर व पृथ्वी से 36 करोड़ मील दूर है। इस ग्रह की गति आठ मील प्रति सेकेंड है। स्थूल रूप में वृहस्पति एक राशि को एक वर्ष में पार कर लेता है। यह पूर्व में उदय होकर पश्चिम में अस्त होता है। अस्त होने के एक माह बाद पुनः उदय होकर प्रकाशित होता है।

भचक्र में 2400 से 2700 तक का क्षेत्र धनुराशि का है। यह राशि सत्वगुणी अग्नितत्व वाली पुरुष राशि है। धनुराशि वृहस्पति की पहली स्वराशि है। यही वृहस्पति ग्रह की इन्द्रधनुषी कामनाओं और आशाओं का प्रतीक है। भचक्र में 3300 से 3600 का मीन राशि का क्षेत्र है जो सौम्य, जलतत्व वाली स्त्री राशि है। यह वृहस्पति ग्रह की दूसरी स्वराशि है। यह वृहस्पति की पुण्य कार्यों करुणा व कृपा की प्रतीक है। धनु के 10 अंश तक वृहस्पति का मूल त्रिकोण होता है। इसके दीप्तांश 9 हैं कलांश 11 हैं। इस गुरु ग्रह के अपने नक्षत्र पुनर्वसु, विशाखा, पूर्वा भाद्रपदा हैं।

वृहस्पति ग्रह को पीतवर्ण प्रिय है। सोना और कांसी इसकी धातु है। गंधक- खनिज, चना, जौ- अनाज, पुखराज- रत्न, अश्व- पशु तथा हाथी पर बृहस्पति का प्रभाव है। यह 3 की संख्या पर प्रभावी है। मार्च, दिसम्बर महीनों पर 3, 12, 21, 30 तारीखों पर यह अपना प्रभाव रखता है। हाथ की तर्जनी अंगुली के मूल में वृहस्पति का वास है। हेमन्त ऋतु, ईशान दिशा, दोपहर समय, स्वराशि धनु, मीन, मीठा रस इसे प्रिय हैं। कालपुरुष के नितम्ब और पांव तलुवे अंगुलियां, कमर, जंघा, गुप्तस्थान पैरों पर इस ग्रह का प्रभाव रहता है। जिन व्यक्तियों के नाम का प्रथमाक्षर य, भ, फ, ठ, द, च वर्ण से प्रारम्भ होता हो तो वृहस्पति को सर्वदा प्रिय लगते हैं। यह ग्रह उत्तराभिमुखी है, स्वभाव से गर्म, आर्द्र, संयमी, विनम्र, गंभीरतायुक्त है। न्याय तथा उत्तम भाग्य का कारक है। ऋग्वेद इसका अपना है। मुक्ति और स्वर्ग का दाता, सुख, विवेक (बुद्धि, ज्ञान, स्वास्थ्य, सिद्धान्तवादिता, उदारता, शान्त स्वभाव, उच्चाभिलाषिता, पुरोहितत्व, राजनीति, सम्मान, वृहस्पति के क्षेत्र हैं। इसका उद्देश्य आध्यात्मिक एवं पारलौकिक सुख का देना है।

चन्द्र की राशि कर्क, बृहस्पति का उच्च स्थान है, चन्द्र के साथ यह चेष्टावली माना जाता है। उच्चस्थ होकर बृहस्पति व्यक्ति को चतुर, सुशील, ऐश्वर्यवान, नीति-निपुण बनाकर प्रसिद्धि देता है। स्वगृही होने पर रसिक चिकित्सा शास्त्री, षट्शास्त्र प्रवीण, दीर्घायु बनाता है। शनि की मकर राशि बृहस्पति का नीच स्थान है। नीचस्थ होकर व्यर्थ कलंकित कराके भाग्य के साथ खिलवाड़ कराता है। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बृहस्पति के नैसर्गिक मित्र हैं; मित्रक्षेत्री होकर उन्नति एवं उच्च पद देता है। शनि, बृहस्पति का पड़ोसी है अतः लौकिक रूप में शनि को उसने सम बना रखा है। बुध, शुक्र, राहु, केतु इसके शत्रु हैं, शत्रुक्षेत्री होने पर तीव्र बुद्धिमान बनाकर भी दुर्भाग्यशाली बनाता है। सूर्य के सम्पर्क से विशेष फलीभूत होता है। पंचम, सप्तम, नवम भावों को बृहस्पति अपनी स्थिति से पूर्ण दृष्टि से देखता है, वैसे इसकी समदृष्टि होती है। सोलह-बाईस- बत्तीस-छत्तीस वर्ष की आयु में पूर्ण फल देता है। बृहस्पति ग्रह लग्न में होने से बलवान होता है, नवम, पंचम भाव का कारक है। शांत स्वभावी है, लोकप्रिय है। यह जिस स्थान पर होता है वहां पूर्ण फल नहीं देता, बृहस्पति की दृष्टि के स्थान ही पूर्ण फल पाते हैं। कहा जाता है कि ‘स्थान हानि करो जीवः’ । यह ग्रह स्त्री राशि में होकर नौकरी कराता है। पुरुष राशि में होने पर स्वतंत्र व्यवसाय में प्रवृत्त कराता है।

बृहस्पति ग्रह – वृहद् उदर, स्थूल, गौर, पीत वर्ण, कफ प्रकृति, भूरे बाल, आकाश तत्व, सत्व गुण युक्त, परमार्थी, मानवता हितैषी, वृद्ध ब्राह्मण है। यह निवृत्ति मार्गी है। कुछ अशुभ फलों का भी दाता है, यथा- बृहस्पति ग्रह, भीष्म पितामह के द्वितीय भाव में होकर उन्हें राज्याधिकार से वंचित करने वाला, राजा दशरथ के पंचम भाव में होकर पुत्र चिन्ता व शोक से ग्रसित कराने वाला, राजा अज के सप्तम भाव में होकर पत्नी वियोग, विश्वामित्र के नवम भाव में होकर अभक्ष्य भक्षण कराने वाला, नल के लाभ भाव में होने से वनवास कराने वाला था।

गुरु (बृहस्पति) केन्द्र त्रिकोण में होकर लक्षावधि दोषों का निवारक होता है। विशोंत्तरी महादशा में इसे 16 वर्ष की अवधि मिली है। यह केवल ज्ञान व बुद्धि का दाता है। जितेन्द्रिय है। काम प्रवृत्तियों पर पूरा नियन्त्रण रखता है। गृहस्थ से सदैव उदासीन अद्वितीय विद्वता एवं पारलौकिक ज्ञान के फलस्वरूप वैराग्य की ओर आकर्षित है। इन्हें न पत्नी प्रिय है न पुत्र। ये सदैव निष्पाप प्रवृत्ति के पोषक हैं। ये अपनी धर्मपत्नी के प्रति भी उदासीन रहे। चन्द्र ने इन्द्र के पराक्रम (मंगल) के निर्देश से छल प्रयत्न किया और तारा से बुध उत्पन्न हुआ। ऋषि भारद्वाज बृहस्पति के पुत्र थे तथा इन्हीं देवगुरु ने अपने दूसरे पत्र कच को संजीवनी विद्या सीखने को दैत्याचार्य शुक्र के पास भेजा था।

ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः ऊं वृं बृहस्पतये नमः।

डॉ0 कुलदीप चंद्र पंत, हरिद्वार
साहित्य विभागाध्यक्ष | जय भारत साधु महाविद्यालय, हरिद्वार | पी.एच.डी.: ‘श्रीमद् भागवत महापुराण में प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांत’

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