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Monday, January 30, 2023
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कविता और ग़ज़ल

बचाओ लाख दिल को, पर मौहब्बत हो ही जाती है – ग़ज़ल

बचाओ लाख दिल को, पर मौहब्बत हो ही जाती है। नज़र आखिर नज़र है यह शरारत हो ही जाती है।। सफ़र इस ज़िन्दगी का तय अकेले...

बेवजह दिल न किसी का दुखाया जाय – ग़ज़ल

बेवजह दिल न किसी का दुखाया जाय। तितली को फूल से हरगिज न उड़ाया जाये।। प्यार ही प्यार हो नफरत न जहां हो कोई। दोस्तों एक शहर...

वहां जो बैठे हैं सत्ता के मद में होकर चूर – ग़ज़ल

वहां जो बैठे हैं सत्ता के मद में होकर चूर । समझ लें वो कि जरूरी नहीं, हो दिल्ली...

महकी हुई हवाओं की मानिन्द आ गए – ग़ज़ल

महकी हुई हवाओं की मानिन्द आ गए। चुपके से आए, आके ख्यालों पे छा गए।। हलचल सी एक होने लगी है वजूद में। सोई हुई ख्वाहिश फिर...

आकांक्षा – जात-पात में मत पड़ो, वर्ण भेद भेद दो

जात-पात में मत पड़ो, वर्ण भेद भेद दो, मनुष्य मात्र एक हो, न किसी में कोई भेद हो। जाति-धर्म भिन्न-भिन्न खान-पान भिन्न-भिन्न। भिन्नता में एकता, हो कर्म...

अफ़सोस ज़िन्दगी के सहारे नहीं रहे – ग़ज़ल

अफ़सोस ज़िन्दगी के सहारे नहीं रहे। कल तक थे जो हमारे, हमारे नहीं रहे। कैसे कहेंगे अपना उन्हें पहले की तरह। उनकी नज़र में अब वो इशारे...

मनमोहनी माया – अनपढ़ गंवार थे वो सन्त कबीरा

अनपढ़ गंवार थे वो सन्त कबीरा जो कहे माया बड़ी ठगनि हम जानी दौलत तेरी बस एक लंगोटी अरे फकीरा, देखा तूने बन्द कमरों में हीरे मोतियों...

लौटकर आ गये हम अपने आशियाने में – ग़ज़ल

लौटकर आ गये हम अपने आशियाने में। अपना साथी न रहा अब कोई ज़माने में।। अब तो लगती हैं बहारें भी खि़ज़ॉ की मानिन्द।1 दिल बहलता नहीं...

रैलियों की धूम

कहीं थू-थू की रैली है, कहीं धिक्कार की रैली कहीं त्रिशूल दिखते हैं, कहीं तलवार की रैली सियासत में प्रदूषण है, विचार गंगा ही मैली है चलो...

नेताजी – जब चुनाव की हूण बैठी ग्ये बात,

जब चुनाव की हूण बैठी ग्ये बात,फुलण बैठी सब्बी पार्टि्यूं क खुला हाथ।सब्बी भाग-भागिक नि थकणा छन,अपण-अपण दांव लगाणा छन। छ्वीट जात्यिूं कु त वो...

एक लड़की की लिखी कविता

किताबों के पन्नों में कविताएं जैसे दबा हो किताबों के बीच एक फूल, किसी के लिए नहीं उसकी सुगन्ध, उसके सौंदर्य का कोई अस्तित्व नहीं। चलो मैं तुम्हें...

बस स्टौप – जिन्दगी की डूंडी-बंगी

जिन्दगी की डूंडी-बंगी ऊबड़-खाबड़ सड़क पर भगणी च मनिख शरीर की ‘बस’, उछल-कूद मचाणी धक्का-मुकि खाणी। जीर्ण-शीर्ण ह्वेगे ‘बॉडी’ ढिल्ल ह्वेगें इन्द्रियोंक ‘नट’, ‘बोल्ट’ तीड़ि गी खुटुक ‘टायर’ फिर बिदहाड़नु च अहम्...

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