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Wednesday, May 25, 2022
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कविता और ग़ज़ल

मनमोहनी माया – अनपढ़ गंवार थे वो सन्त कबीरा

अनपढ़ गंवार थे वो सन्त कबीरा जो कहे माया बड़ी ठगनि हम जानी दौलत तेरी बस एक लंगोटी अरे फकीरा, देखा तूने बन्द कमरों में हीरे मोतियों...

लौटकर आ गये हम अपने आशियाने में – ग़ज़ल

लौटकर आ गये हम अपने आशियाने में। अपना साथी न रहा अब कोई ज़माने में।। अब तो लगती हैं बहारें भी खि़ज़ॉ की मानिन्द।1 दिल बहलता नहीं...

रैलियों की धूम

कहीं थू-थू की रैली है, कहीं धिक्कार की रैली कहीं त्रिशूल दिखते हैं, कहीं तलवार की रैली सियासत में प्रदूषण है, विचार गंगा ही मैली है चलो...

नेताजी – जब चुनाव की हूण बैठी ग्ये बात,

जब चुनाव की हूण बैठी ग्ये बात,फुलण बैठी सब्बी पार्टि्यूं क खुला हाथ।सब्बी भाग-भागिक नि थकणा छन,अपण-अपण दांव लगाणा छन। छ्वीट जात्यिूं कु त वो...

एक लड़की की लिखी कविता

किताबों के पन्नों में कविताएं जैसे दबा हो किताबों के बीच एक फूल, किसी के लिए नहीं उसकी सुगन्ध, उसके सौंदर्य का कोई अस्तित्व नहीं। चलो मैं तुम्हें...

बस स्टौप – जिन्दगी की डूंडी-बंगी

जिन्दगी की डूंडी-बंगी ऊबड़-खाबड़ सड़क पर भगणी च मनिख शरीर की ‘बस’, उछल-कूद मचाणी धक्का-मुकि खाणी। जीर्ण-शीर्ण ह्वेगे ‘बॉडी’ ढिल्ल ह्वेगें इन्द्रियोंक ‘नट’, ‘बोल्ट’ तीड़ि गी खुटुक ‘टायर’ फिर बिदहाड़नु च अहम्...

व्यथित क्यों हो तुम?

मेरा दिल डर रहा है, ये भयानक आवाजें न निकालो इस भयानक रात में, इस बरसात में, यूं झगड़कर, यूं रगड़कर किसे डरा रहे हो, शायद तुम...

लाश अर कफन – चिता पर धरिं एक लाश

चिता पर धरिं एक लाश, मिण मिणैकि, कफनम बोल्द- ‘‘अरे छुछा ? मित त फुके-फुके पण- तु किले फुकेणू छई मित मृत्युक मर्यूं छौ, तु बेमौत किले मरणू छई। आगि...

शैल-शिशु

पत्थर से उपजा उसका बचपन विकटता को चीर पल्लवित हुआ जिसका यौवन, यौवन जो बिता न पाया अपने पल, अधेड़ हुआ मन पत्थर से उपजा उसका बचपन जिजीविषा...

चदरि, रंग बिरंगी (गढ़वाली कविता)

दुन्यां कि यिं चदरि पर, रंग कति रच्यां छना, पैन गार कांड कखि, कखी फूल बिछ्यां छना। भ्यूंळ डाळिमु घुघुति, घुर्र-घुर्र घूरणि च, मयल्दू ज्युकुड़ि कैकि, झुर्र-झुर्र...

नेता बन जा

पढ़ना-लिखना डिग्री डिप्लोमा सब कुछ है बेकार। कभी न दे पायेंगे भैय्या ये तुझे रोजगार।। जूते चप्पल तो क्या एड़ियां भी घिस जायेंगी। धोती-कुरता पैंट क्या लंगोट...

सर्गा दिदा पाणि…

घनघोर अन्ध्यरु; रुणझुण बरखा, हैड़ा डाळु मूड़ ग्वाठु ग्वरूं तैं कादै लग्यां फट्ट-फट्ट कना छिन बीच-बीच म मि गुठ्यळु जबदस्ति खसुंणूं कखि बाघ त... गड़गड़ाट, चड़चड़ाट अबि बुगान्द तबि अचानक जोर...

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