22.2 C
Dehradun
Wednesday, May 25, 2022
संपादकीय जन-सेवा के उद्देश्यों से भटकती राजनीति

जन-सेवा के उद्देश्यों से भटकती राजनीति

जब भी देश व राज्यों में चुनाव का समय आता है तब-तब सभी के मन-मस्तिष्क में एक ही विचार कौंधता है, क्या इस बार राजनीतिक पार्टियाँ स्वच्छ छवी के नेताओं को पार्टी का टिकट देंगी? लेकिन अफसोस भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधी-करण के चलते वर्तमान राजनीति अपने पवित्र उद्देश्यों से भटकर अपराध के मकड़जाल में फंस चुकी है। भौतिकवाद के इस युग में राजनीति का आधार त्याग व बलिदान न होकर लूट-खसोट और स्वार्थ हो गया है। परिणामस्वरुप आज सम्पूर्ण देश अपराध व भ्रष्टाचार से ग्रसित है। अगर समय रहते समस्त राजनीतिक दलों ने इस पर अंकुश नहीं लगाया गया तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

तेजी से बदलते इस दौर में राजनीतिज्ञों के मन में जन सेवा की भावना कम, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की प्रवृत्ति ने भ्रष्टाचार को चरम सीमा पर पहुंचा दिया है। देश का कोई ऐसा राज्य नजर नहीं आता जहां भ्रष्टाचार का बोलबाला न हो। भौतिकवादिता की चकाचैंध में राजनीतिज्ञ ही नही अपितु प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थों को ही सर्वोपरि मानकर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपराध और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। जहां तक राजनीति के अपराधीकरण की बात है तो राजनीति में अपराधियों के प्रवेश के लिए सभी प्रमुख राजनैतिक दल समान रूप से जिम्मेदार हैं। गंभीर और विचारणीय प्रश्न यह है हिस्ट्रीशीटर व दस्युओं को जिताकर यह दल समाज को क्या देना चाहते हैं?

कटु सत्य यह भी है कि राजनीति के क्षेत्र में अपराधी प्रवृत्ति के लोगों के बढ़ते दबदबे ने समाज के बुद्धिजीवियों को राजनीति से विमुख कर दिया है। जिसे किसी भी कीमत पर सही नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि राजनीति जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को अपराधिक व्यक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। अतः ऐसे कठिन दौर में समाज के समस्त जागरूक नागरिकों, बुद्धिजीवियों एवं जिम्मेदार संस्थाओं का फर्ज बनता है कि वे समाज में अन्याय और भ्रष्टाचार से लड़ने का जज्बा पैदा करें। वहीं सत्तासीन सरकारों को भी चाहिए कि इस दिशा में ठोस कदम उठाये। समस्त राजनीतिक दलों को यह स्मरण रखना होगा कि अगर एक बार जनता का विश्वास उन पर से उठ गया तो सभी को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

Get in Touch

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest Posts

खतरों की आहट – हिंदी व्यंग्य

कहते हैं भीड़ में बुद्धि नहीं होती। जनता जब सड़क पर उतर कर भीड़ बन जाये तो उसकी रही सही बुद्धि भी चली जाती...

नतमस्तक – हिंदी व्यंग्य

अपनी सरकारों की चुस्त कार्यप्रणाली को देख कर एक विज्ञापन की याद आ जाती है, जिसमें बिस्किट के स्वाद में तल्लीन एक कम्पनी मालिक...

कुम्भ महापर्व 2021 हरिद्वार

कुंभ महापर्व भारत की समग्र संस्कृति एवं सभ्यता का अनुपम दृश्य है। यह मानव समुदाय का प्रवाह विशेष है। कुंभ का अभिप्राय अमृत कुंभ...

तक्र (मट्ठे) के गुण, छाछ के फायदे

निरोगता रखने वाले खाद्य-पेय पदार्थों में तक्र (मट्ठा) कितना उपयोगी है इसको सभी जानते हैं। यह स्वादिष्ट, सुपाच्य, बल, ओज को बढ़ाने वाला एवं...

महा औषधि पंचगव्य

‘धर्मार्थ काममोक्षणामारोण्यं मूलमुन्तमम्’ इस शास्त्रोक्त कथन के अनुसार धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष हेतु आरोग्य सम्पन्न शरीर की आवश्यकता होती है। पंचगव्य एक ऐसा...