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Thursday, September 29, 2022
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा मानसिक स्वास्थ्य के लिये सदाचार आवश्यक है

मानसिक स्वास्थ्य के लिये सदाचार आवश्यक है

यह सर्वदा सत्य है कि जिसका मन बिगड़ जाता है उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ जाता है। संयमहीनता, असत्य, अभिमान, ईर्ष्या, दम्भ, क्रोध, हिंसा, कपट आदि दुर्गुण बिगड़े मानसिक स्वभाव के लक्षण हैं। अगर सत्य कहा जाय तो इन्हें हम सूक्ष्म मानसिक रोग भी कह सकते हैं। दुष्टस्वभाव वाला मनुष्य अपनी इन्द्रियों की प्रखरता को गँवा बैठता है तथा अपने शरीर को भी रोगी बना देता है। किस दोष से किस रोग की उत्पत्ति होती है इसका वर्णन नीचे लेख में देना समीचीन होगा –

(1) संयमहीनताः– जीभ का संयम टूट जाने से वह जैसे चाहे स्वाद में रस लेने लगती है और चाहे जितना खाने को आतुर दिखाई देती है। जिस कारण पेट में अधिक अयोग्य भोजन चला जाता है जिससे पेट तथा आंतों में रोगों की उत्पत्ति हो जाती है। इसी प्रकार जिह्वा के असंयमी होने पर वह जिस प्रकार की वाणी बोलती है उसके द्वारा मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं को भी हानि पहुंचती है तथा कुछ समय बाद जीभ कैंसर या लकवा हो जाने की स्थिति में पहुंच जाती है। जो बच्चे जन्मजात गूंगे होते हैं वे पूर्वजन्म में किये गये वाणी के अपराध का दण्ड इस जन्म में भोगते हैं। यह सब कुछ देखकर हमें कुछ सबक सीखना चाहिये ताकि अगले जन्म में हम वाणी  अपराधजन्य रोगों से बच सकें।

बोली एक अमोल है जो कोई बोलहि जानि।
हिये तराजू तोल के तब मुख बाहर आनि।।

अर्थात् वाणी एक अमूल्य निधि है, बशर्तें कोई उसे बोलना जाने। वाणी को सर्वप्रथम अपने हृदय रूपी तराजू में तोलें और तब उसे मुंह से बाहर निकालें। तभी वह अमूल्य निधि रह सकती है।

(2) असत्यः- जो कोई भी मनुष्य झूठ (असत्य) बोलता है उसकी जीवन शक्ति नष्ट हो जाती है। जिस कारण कोई भी रोग उसे अपने शिकंजे में ले लेता है। यह सर्वदा सत्य है कि हमारी जीवन शक्ति का आधार तेज (ओज) है, और यह ओज हमारे शरीर की सात धातुओं रस, रक्त, माँस, मेद, मज्जा एवं शुक्र की अंतिम परिणति है। मनुष्य के मुख पर जो आभा मंडल दिखाई देता है वही तेज (ओज) है जिसका प्रमाण शरीर में हथेली पर रखे बिन्दुवत जल के बराबर होता है। इस प्रकार असत्य बोलने पर वह तेज नष्ट हो जाता है जिससे उसकी मुख की आभा मलिन हो जाती है इससे उसके हृदय एवं मस्तिष्क के ज्ञानदायी तंतुओं को भी हानि पहुंचती है। जिस कारण मनुष्य हृदय रोगी, पागलपन, पथरी, लकवा आदि रोगों का शिकार हो जाता है।

(3) अभिमान– मनुष्य में वात, पित्त एवं कफ इन तीन दोषों के द्वारा उत्पन्न होने वाला अभिमान भी एक रोग है। इसलिये कहा गया है कि मनुष्य जो भी पाप करता है उसके मूल में अभिमान ही होता है। यह अभिमान ही मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण कहलाता है तथा सारे दोषों तथा रोगों के अपनी ओर आकर्षित करने वाला चुंबक तुल्य होता है। इसलिये अभिमान व्यक्ति वात, पित्त एवं कफ के छोटे-बड़े रोगों से सदैव ग्रसित रहता है।

(4) ईष्र्याः– ईर्ष्या का अभिप्राय है डाह करना। डाह शब्द संस्कृत के दाह (जलन) का सूचक है तथा इसकी उत्पत्ति शरीर में पित्त दोष के कारण होती है तथा पित्त भी दाह का सूचक है। ईर्ष्या के कारण मनुष्य की इन्द्रियों की तेजस्विता नष्ट हो जाती है तथा मनुष्य की बुद्धि एवं हृदय पित्त की अग्नि (तेजाब) में जल जाते हैं। ऐसा मनुष्य कभी भी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता है प्रगति उससे कोसों दूर हो जाती है तथा वह पथरी (इसके मूल में भी पित्त प्रधान होता है), दाह, यकृत की खराबी आदि रोगों से ग्रसित रहता है।

(5) दम्भः– दम्भ शब्द में जिस भारीपन का अहसास होता है वह विकृत कफ का बोध कराता है। दम्भी मनुष्यों के स्वभाव में कफ के समान भारीपन आ जाता है। जिसके कारण उसकी समस्त इन्द्रियां अपनी तेजस्विता को छोड़कर स्थूल हो जाती हैं। जिस कारण मनुष्य के शरीर की बनावट में विकृति, भारीपन, गैस आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।   

  (6) क्रोध- विकृत हुये मन से अशक्य-जैसी अनेकानेक इच्छाओं की पूर्ति न होने से अथवा उनमें बाधा आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है। क्रोधी मनुष्य दूसरे को हानि पहुंचा सकेगा या नहीं यह तो देवाधीन है परन्तु सर्वप्रथम वह अपने को ही हानि पहुँचाता है। क्रोध करने में मनुष्य के मस्तिष्क को अपनी बहुमूल्य ओज शक्ति का उपयोग करना पड़ता है। इस प्रकार क्रोध की अग्नि में उसकी अमूल्य ओज शक्ति विनष्ट हो जाती है जिससे उसकी जीवन शक्ति भी नष्ट हो जाती है। उसके बाद क्रोध के मस्तिष्क में आते ही उसके विकृत प्रवाह से मस्तिष्क के ज्ञान तंतु भी क्षीण हो जाते हैं। जैसे बिजली का प्रवाह घर में लगे बल्ब को जलाता रहता है लेकिन बिजली जब अधिक वोल्ट में प्रवाहित होती है तो बल्ब फ्यूज हो जाता है तथा कभी-कभी यह हाई-वोल्टेज घर को भी नुकसान पहुंचाती है। इस प्रकार हाई-वोल्टेज से रक्षा के लिये अलग से फ्यूज की व्यवस्था की जाती है। इसी प्रकार ईश्वर ने मानव शरीर में भी क्रोध से रक्षा के लिये संयम तथा विवेक नामक दो फ्यूजों की व्यवस्था की है। उसके त्याग देने पर ओज का अत्याधिक प्रवाह क्रोध के रूप में उत्पन्न हो जाता है और मस्तिष्क के अनेक भागों को जोखिम में डाल देता है। विशेषकर क्रुद्ध मस्तिष्क को अत्यधिक मात्रा में रक्त की आवश्यकता पड़ती है। यह रक्त राशि मस्तिष्क की ओर जाने वाले लघु रक्त प्रवाह को खींच लेती है इसलिये   क्रोधी मनुष्य का मुख एवं आँखें लाल हो जाती हैं। जब मनुष्य हंसते है तब भी उसका मुख मंडल लालिमायुक्त हो जाता है। उस वक्त मुख की समग्र माँस-पेशियां विकसित होने पर हृदय की ओर से खून खिंच आने से ऐसा होता है। विशेषकर शुद्ध खून मिलने से इन पुलकित पेशियों से मुख पर जो लालिमा आती है वह लाभदायक होती है तथा इससे मनुष्य के सौंदर्य में वृद्धि हो जाती है। लेकिन ठीक इसके विपरीत क्रोधी की शक्ल बिगड़ जाती है तथा उसकी बुद्धि एवं बल भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं।

(7) हिंसाः- हिंसा, क्रोध एवं अभिमान से उत्पन्न होती है। हिंसा में प्रवृत्त रहने वाले व्यक्ति का रक्त सदा खौलता एवं गर्म रहता है। हिंसा से मस्तिष्क एवं हृदय दोनों दूषित हो जाते हैं। अभिमान एवं क्रोध से उसमें कई रोग उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसे मनुष्य हृदय रोगी भी हो जाते हैं। जो सहृदय मनुष्य होता है वह दूसरों के दुःखों को देखकर कातर एवं द्रवित हो जाता है तथा अपने दुःखों में उसका हृदय वज्र के समान कठोर हो जाता है। यह हृदय का सत्य एवं वास्तविक गुण है। लेकिन जो मनुष्य हिंसक होते हैं उसके हृदय से ये गुण नष्ट हो जाते हैं। ऐसा मनुष्य दूसरों के दुःखों को देखकर उसका परिहास करता है लेकिन जब उसके ऊपर दुःख आता है तो वह तुच्छ श्रेणी का कायर एवं भीरू बन जाता है। तत्पश्चात हृदय एवं शरीर में गर्म रक्त प्रवाहित होने से शरीर में वात, पित्त एवं कफ की विकृति के कारण वह महाभयंकर रोगों का शिकार बन जाता है।

(8) छल-कपटः– कपट करने वाला मनुष्य भी हिंसा ही करता है परन्तु उसकी हिंसा करने की युक्ति मायामय (कपटमय) होने से दिखाई नहीं देती वह साधारण विष जैसी होती है। इस प्रकार का मनुष्य भी कई बीमारियों का शिकार हो जाता है। उसे जो रोग रूपी दण्ड मिलता है वह धीरे-धीरे घातक विष के समान असर करने वाला हो जाता है।

इसलिये किसी भी मनुष्य को शारीरिक स्वस्थता के लिए मानसिक रूप से स्वस्थ रहना भी आवश्यक है। यदि वह शारीरिक रूप से स्वस्थ है तथा मानसिक रूप से अस्वस्थ है तो उसे स्वस्थ कदापि नहीं कहा जा सकता है।

आयुर्वेद शास्त्र में स्वस्थ किसे कहा जाता है उसका वर्णन इस प्रकार किया गया है-

समदोष समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते।।

अर्थात जिस पुरुष के शरीर एवं मानस दोष, जठराग्नि तथा धात्वाग्नि रसादि धातु, त्वचादि उपधातु, पुरीषादि मल और उनकी क्रिया सम हो तथा उसका आत्मा, शरीर, इंद्रिय और अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकार) प्रसन्न- निर्मल लघु, अपना कार्य करने में पटु है उसे ही स्वस्थ कहा जाता है। इस प्रकार हमें उपरोक्त विकारों से सदैव बचना एवं दूर ही रहना चाहिये, तभी हम स्वस्थ रह सकते हैं।  

डॉ0 चन्द्रमोहन बड़थ्वाल, कोटद्वार
से.नि जिला आयुर्वेदिक/यूनानी अधिकारी

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