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Thursday, September 29, 2022
कविता और ग़ज़ल गढ़वाली कविता नेताजी - जब चुनाव की हूण बैठी ग्ये बात,

नेताजी – जब चुनाव की हूण बैठी ग्ये बात,

जब चुनाव की हूण बैठी ग्ये बात,
फुलण बैठी सब्बी पार्टि्यूं क खुला हाथ।
सब्बी भाग-भागिक नि थकणा छन,
अपण-अपण दांव लगाणा छन।

छ्वीट जात्यिूं कु त वो ह्वे गै भगवान,
अर गरीब थै भी अपण बताणा छन।
पोरु साल ‘जल प्रलय’ माँ जो ह्वे छौ उजाड़-बिजाड़,
बौगिगी छुट्टिगीं गांव, गुठ्यार, सब्यूं मां टूटी दुख कु पहाड़।

नेतोंन हैलीकॉप्टर मां रेस लगै-लगै कि मारी दहाड़,
कि हम सब छां तुम्हर दगड़ि पर तुम नी छ्वड्यां अपरु पहाड़।
पर अब भी सब उन्नी च उजाड़-बिजाड़ ‘जन्नी का तन्नी’,
अर सब्बी उड़दरा, बुथ्यंदरा काटि गीं कन्नी।

आपदा मां जो मिल्यूं छयो वो सब्बी डकारी,
ऐ ग्या ‘जनता दरबार’ मां भीख मंगणा की बारी।
हमरी बारी त भौत बाद मां आली,तब तक आम पक्यां छन, खूब खाली।

धन्य दौं हम, धन्य च लोकतंत्र की माया,
समय-समय फर बदलिन नेतोंन अपणी काया।
असली-नकली कु खेल ‘नेताजी’ जनम भर चलणू रालू,
तब तक वो अपणा देश थैं नोच-नोचिकि खालू।

By: सरोजनी कुकरेती

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