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Thursday, September 29, 2022
कविता और ग़ज़ल हिंदी कविता व्यथित क्यों हो तुम?

व्यथित क्यों हो तुम?

मेरा दिल डर रहा है, ये भयानक आवाजें न निकालो

इस भयानक रात में, इस बरसात में,

यूं झगड़कर, यूं रगड़कर किसे डरा रहे हो,

शायद तुम दुखी हो, तभी तो रो रहे हो।

क्या अधिक वेदना है, क्या अधिक दुःख है

इतनी तेजी से, इतने जोरों से, कितना सारा

आंसू यूं ही क्यों बहा रहे हो, आखिर क्यों ?

तुम्हें कुछ परेशानी है क्या, बताओ आखिर क्यों व्यथित हो तुम ?

है व्यथित हृदय, दुःख को बांटकर, कष्ट को कुछ कम करो

दुनिया में जिन्दगी है, तो जिन्दगी में पीड़ा

पीड़ा का कारण है, कष्ट का निवारण है

वेदना जितनी बंटेगी उतनी घटेगी

कारण अलग-अलग है, सब पीड़ित हैं, सब दुःखी हैं

फिर तुम अलग क्यों हो, साथ में आ जाओ

गम बांटेंगे, घाव हल्के होंगे

कुछ तुम, कुछ मैं, मलहम लगायेंगे

मिलकर हरे घावों की काली पीड़ा को कम करेंगे।

कन्धे मिलाकर चलेंगे, कुछ गम तो कम होंगे

आओ एक नया प्रयास करेंगे, कुछ विकास करेंगे

मंजिलें तय करनी होंगी, रस्ते ढूंढने होंगे

कितना भी दुष्कर क्यों न हो मंजिलें तो पानी ही होगीं

रास्ते तो मंजिल नहीं, रास्ते तो केवल रास्ते हैं

कठिन रास्तों पर, न ललचायें, न डगमगाये

चलते ही चलना है, रास्ते तो केवल रास्ते हैं

रास्ते तो पहुंचायेंगे ही मंजिल तक,

केवल चलना तो है, आओ चलें

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