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Wednesday, May 25, 2022
व्यंग्य नतमस्तक - हिंदी व्यंग्य

नतमस्तक – हिंदी व्यंग्य

अपनी सरकारों की चुस्त कार्यप्रणाली को देख कर एक विज्ञापन की याद आ जाती है, जिसमें बिस्किट के स्वाद में तल्लीन एक कम्पनी मालिक के पास भागा-भागा कोई व्यक्ति आकर सूचना देता है कि ‘फैक्ट्री में आग लग गई है’ मालिक प्यार से बिस्कुट कुतरते हुये लापरवाही से कहता है, ‘मुझे क्या’? वह व्यक्ति स्पष्ट करता है। ‘आपकी फैक्ट्री, में आग लगी है। मालिक उसी अदा को दुहराते हुये कहता है, ‘तो तुझे क्या?’

हमारी सरकारें इतनी लापरवाह नहीं है। अब यही देख लीजियें, सरकार को सूचित किया जाता है- पड़ोसी हमारी सीमा पर आकर अकारण हिंसा कर रहे हैं और हमारी सेना के बंधे हाथ विवश हैं। क्या करें! 

सरकार की ओर से प्रतिक्रिया उभरती है, धैर्य रखिये और शांति बनाये रखिये। यहीं हमारी विश्व नीति है।

मीड़िया विरोध करती है, हम कब तक चुप बैठ कर देखते रहेंगे। हम सहते रहें और वे हमारे धैर्य की परीक्षा लेते रहे। हमारे सैनिक यों बिना लड़े मारे जाने के लिये अभिशप्त क्यों हों! 

सरकार के कानों में मीडिया के जूं रेंगना आरम्भ होते हैं। उधर से (देर से ही सही) जवाब आता है, हम विरोध प्रकट कर रहे हैं।

जब जनता भी मीडिया का साथ देकर शोर मचाती है और सरकार से जवाबी हमले की मांग करती है तो सरकार को पूरी तरह जागना पड़ता है। अब वह पूरे जोर-शोर से बयान देती है।

‘हम कड़ी प्रतिक्रिया प्रकट कर चुके हैं।’

उससे पूछा जाता है कि यदि वे फिर भी न मानें तो क्या होगा यानी क्या किया जायेगा!

उधर से जवाब मिलता है, ‘हम प्रतिक्रिया और कड़ी कर देंगे।

ऊबी खीझी मीडिया बनाम जनता पूछती रहती है और जवाब में एक ही बात को घुमा-फिरा कर सुनती रहती है। सरकार की ओर से अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपना विरोध दर्ज करने के दावे भी उसे आश्वस्त नहीं करते।

रही बात सेना की तो सैनिक से लेकर सेनाध्यक्ष तक तब अपनी सीमा (लक्ष्मण-रेखा) से परिचित हैं कि सीमा पार से आने वालों के सामने आदेश आने तक नतमस्तक रहना पड़ेगा। यह उन पर है कि मस्तक का क्या करें

डॉ0 आशा रावत, देहरादून
एम.ए. (राजनीतिक विज्ञान, हिन्दी), बी.एड | पी.एच.डी.‘हिन्दी निबंधों में सामाजिक चेतना’ पर शोध।

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