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Wednesday, May 25, 2022
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अपणु खून – गढ़वाली कहानी

गौं कु हरि सिंह कति दिन से बीमार छौ। आज वेकि हालत कुछ जादा ही खराब छै। कुछ लोगु क नजर म त वू कुछ ही घड़ि कू मेहमान छौ।

हरि सिंह वूं मनिख्यूं म गंणे जौद छौ, जौं से भाग्यविधाता सदनि कु रुठीं रै। द्वी ब्यौ करण पर बि वेतैं पारिवारिक सुख की प्राप्ति नि ह्वे सैकि। वेकि द्वी घरवळि, वेतैं निसंतान, इखुलि छोड़ी एक क बाद एक स्वर्गवासी ह्वेगीं। आज बि वू इखुलु ही मृत्यु से लड़नू छौ। मान सिंह वेकु कंणसु भाई छौ पंणि अपंणि घरवळि, दुर्गा क दबाव म औंण क कारण, वु हरि सिंह से बुल्दु, बच्यौंदु तक नि छौ।

गौं क जनन, द्वी खाश जगा ही खुलि की बात चीत कै सकदी। अर वु द्वी जगा छीं, पंद्यर या फिर बूंण। आज पंद्यरम, हरि सिंह ही वूंकु चर्चा कू विषय छौ बंण्यूं। दीपा देवी, रूप सिंह की घरवाली न विशेष अंदाज म मुंड हलौंद बोलि, ‘कुजणि भै, आज ये गौ क भाग्य म क्या च लिख्यूं? वूं जिठा जी कि हालत ठीक नी। वू बुन बच्यौंणै बि नि छी। हमर वु बतौंणै छा कि आज वूंकि हालत भौत खराब च।’

पंद्यर अई मान सिंह की घरवळि दुर्गा तैं छोड़ि और सब दुखी छा। वींन दीपा की बात अंणसुंणी कै दै अर अपंणि गागर भरण लगिगी। घर पौंछद ही वीन मान सिंह कू बोलि, ‘यख क्या छौ करणै, अबि जैकि अपंण भाई तैं देखि आवा। भाई क नाता न सही त लोक लाज क नाता सही। भोल प्रभात क्वी इनुं त नि बुलंण कु कि दिखण तक नि आई। दीपा दीदि, पद्यंर म छै बुनी कि वूंकि हालत आज भौत बुरि च।’

दुर्गा कू आदेश शिरोधार्य कैकि मान सिंह सीद हरि सिंह क घर पौछिगी। वख कुछ लोगु की भीड़ छै लगीं। बिना अपंण भाई तैं मिल्या वू लोगुक बीच एक किनर पर खडु छौ। प्रधान दयाराम की नजर जब वेपर पोड़ त वूंन बोलि, ‘भुला मान सिंह, तु अपंण ही आंखुन, अपुंणु बड़ु भाई की बुरि हालत दिखंणु छै। तेरु सिवाय वेक और क्वी सारू नी। अरे, जब तक जान च तब तक आपसी मन मुटाव, झगड़ा-कलह चलद ही रदीं। फिर बि मनिखि तैं अपुंणु कर्त्तव्य नि भुलणु चैंद। मेरु बुल्यूं मनदी त तलि काटल जा, अर डॉक्टरनी प्रतिभा तै बुलैकि ला। सरकारि अस्पताल म मनी डॉक्टरनी च वा। आजकल छुट्टि पर घौर अईं। वा क्या बतौंद।’

प्रधान जी कि हर बात तैं मानसिंह समझणू छौ पंणि डौर त दुर्गा कि छै जैंक समंणि वू भिग्यूं बिरलु सि रौंद कंपणू। ये वास्त वु वख बटि चुपचाप खिसकि गी। प्रधान जी कु बुल्यूं कति लोगुन सूंणि, पंणि काटल जौंण कू क्वी तैयार नि छा। काटल गौं त नजदीक ही छौ पंणि सवाल छौ डॉक्टरनी की फीस अर दवयूं कु खर्च कू। हरि बचु नि बचू। वेकु कंणसु भुला मान सिंह पैलि ही पुछड़ि दिखैगे छौ। पैंसौं कू लोभ वेसि हर मनिखिम रौंद। यी लोभ अपुंणू तैं परायु बंणै की जानि दुश्मन बंणै दींद।

मानसिंह कू इनूं व्यवहार देखी प्रधान जी तै बड़ु दुख होय। वूंन कबि नि सोचि छौ कि पीठि कु भाई, मृत्यु शय्य पर पड़्यूं बड़ा भाई क दगड़ इनु बुरु व्यवहार कैरि सकदा प्रधान जी यी बात पर चिंचित ही छा कि गौकु प्रेम सिंह न प्रधान जी म बोलि, ‘बोड़ा जी, मानसिंह न तुमरु बुल्यूं नि मानु त क्वी बात नी। मि लौंदु डॉ0 प्रतिभा तैं।’ इनु बोलि वू तलि काटल कू पैटिगे।

हरि सिंह कि हालत बिगड़ा दि ही जौंणी छै। बिना पांणि कु माछु सि छौ वुछटपटौंणू। वेकु क्वी अपुंणु हूंदू त वेकि समंणि बैठदू। वेतैं सारु दीदू अर वेकु सुख-दुख पुछदू। वू तनि र तरसुणू। लोग डॉक्टरनी कु बाटु छा दिखंणै अर हरि सिंह मौत कु इंतजार करणू छौ।

अबि दिन घार म बि नि गे छौ तबि प्रेम सिंह डॉ0 प्रतिभा तै लेकि ऐगी। वूंक औंद ही हरि सिंह क घर पर भारि भीड़ लगिगी। यी भीड़ म मर्दू से जननु कि संख्या जादा छै। कुछ जनन मरीज तैं दिखण कू नि छा अयां बल्कि जननु डाक्टरनी तै दिखंण अयां छा। दुर्गा बी वूंम ही शामिल छै।

डॉ0 प्रतिभा न एक कुशल डाक्टरनी क नाता, हरि सिंह की पूरि जांच करण का बाद बोली, ‘मरीज कू गार्जियन कूं च। मि वूंसे क्वी खाश बात करण चौंदू।’ इनुं सुणद ही सब लोग एक दुसर कु मुख छा दिखणै। तबि प्रधान जी न बात सभांळिक डॉक्टरनी तै हर बात विस्तार पूर्वक बतैदे।

डॉक्टरनी बोलि, ‘प्रधान जी, मरीज तै खून कि बड़ि जरूरत च। खून नि मिलंण से कुछ बि खतरा ह्वे सकद।’

बातचीत चलंणी छै तबि हरि सिंह बेहोश ह्वेगे। वेकु चेहरा-मोहरा बदलेगी। भीड़ कट्ठि ह्वेगे। ईश्वर कि या बड़ि प्रेरणा छै कि मान सिंह अर दुर्गा वेक नजदीक ही खड़ा छा। डॉ0 प्रतिभा न मरीज कि मांस पेस्यूं तैं झकोलि त हरि जरा होश म ऐगी। वेकि अधबुजि आंखि इनैं उनैं छै टपरौंणी। जनि वेकि नजर, समंणि खड़ु मान सिंह पर पोड़ तनि वेक सुख्यां ओंठू पर एक हल्कि मुस्कान छै अर आंखु बटि आंसु कि धार छै बगंणी।

‘खून, पांणि से बकलु हूंद’ या एक पुरणि मिसाल च। अपंण बड़ा भाई की इनु हालत देखि की मानसिंह क आंसु छा बगणै। मन कु मैल धुलिगी छौ। आंसु फुंजद अर गगलौंद वेन डॉक्टरनी म बोलि, ‘डॉक्टरनी जी खून की जतना बि जरूरत होली, मि द्यूलु पंणि तुम मेर भाई तै बचै द्या। आज दिन तक मेरि अकल पर पत्थर रैन पड्यां जु मीन अपंण पिता समान बड़ा भाई की देख-रेख नि कैरी। मि आप तै एक खाश बात या बि बतै दींदू कि हम द्वी भयूंक् खून ही एक नी बल्कि ‘गु्रप’ बि एक ही च। मितै खूब याद च कि एक बार मेरि सिर पर चोट लगंण से भौत खून निकिळिगे छौ। मेरू यी भाई मितैं सरकारि अस्पताल कोटद्वार ल्हीगे। खून की मांग हूंण पर, भाई न अपुंणु ही खून दे छौ। डॉक्टर न तब बतै छौ कि हमरु खून ‘गु्रप’ एक ही च। आप बिना संकोच क मेर खून दे की यूं तै बचै द्या।’

डॉक्टरनी प्रतिभा उनैं, मान सिंह कू खून ल्हींणी छै, इनैं अपंण खून कू असर देखि की कति लोगु कि आंख्लि आंसुर तर छै।

श्री जगदीश देवरानी, नजीबाबाद
सन् 1955 से हिन्दी एवं गढ़वाली में लेखन कार्य

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