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Wednesday, May 25, 2022
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भाग्य की भताक – गढ़वाली कहानी

अपंणि-अपंणि समझ क अनुसार मनिख्यूंन भाग्य कू नामकरण कैर। कैन वेतैं समैं नाम दे, त कैन संयोग बोलि। कुछ बुद्धिजीव्यूं न वेकु तैं अदृश्य बोलिकी अपंणी योग्यता कू परिचय दे। नाम कि भिन्नता हूंण पर बी सब यीं बात पर रजामंद ह्वेगी कि भाग्य भौत बलवान च। अपंण बल क आधार पर वू सब्यूं तैं, इच्छानुसार रोंद नचौंणू।

गौं कु धनिराम जू कबि शनेश्वर क नाम से जणेंदु छौ, भाग्य कि एक ही भताक से धनिराम बणिगे। शनैश्वर उर्फ ‘शनि’, शंकुर बोडा की मात्र इकलौति संतान छै। या वूंकि तिसरि घरवलि कि देन छै। शनि की ‘साढ़े सति’ हूंण क कारण शनि न माँ टोकि दे। वेकि माँ वेतैं मात्र तीन सालकि उमर म छोड़ि ये असार संसार से विदा ह्वेगी। बात या छै कि जैं राशि पर बालक कु जन्म ह्वे छौ, वीं पर शनि कि ‘साढ़ि सति’ चलणी छै। ‘सढ़ि सति’ कू अच्छु या बुरु असर ‘साढ़े सात’ साल तक रौंद, तबि वेकू ‘सढ़ि सति’ बुलेगे।

बालक शनि कू जन्म ल्हींण पर, शंकुर बोड़ा वेकि ‘जन्म कुंडलि’ बणौंण कु गौं क महान ज्योतिष विद् पं0 ब्रह्मानंद जी क घर पौंछिगे। पंडित जी न कुछ खाश चिह्नु क आधार पर बालक कू नाम शनेश्वर रखण की राय दे की या भविष्यवाणी कै छै कि आठ साल तक बालक कू जीवन बड़ु कष्ट कारक रौलु। मातृ शोक बी संभव च। वूंकी या भविष्यवाणी अक्षरसः सहि ह्वेगी। तीन साल की उमर म ही वेकी माँ वेतैं छोड़ि स्वर्गवासी ह्वेगी। बालक शनि अनाथ ह्वेगे। बिना माँ का वू एक-एक गफ्फा कू तरसंणू रैगी। शंकुरु बोडा का दिन बी गरीबी म ही कटेंणै छा अब बिना माँ क बच्चा कू दुख वूंक वास्त असह्य ह्वेगी छौ। अधेड़ अवस्था, आर्थिक तंगी अर नारि वियोग न वू कुछ बि करण लैक नि राख।

एक पुरंणि कहावत च कि विषैलु गुरौ कु बच्चा बी सुंदर ही लगद। वेक प्रति हर एक क मन म दया भाव उमुड़ि जौंद। गौंक जनन्यूं का हृदय म शनि का प्रति बी यी भाव पैदा ह्वेगे छा। वेकि पेट-पूजा की समस्या त हल ह्वेही जौंदि छै पंणि वेकु बाबु शंकुरू बोडा कति बेलि भूखु ही रौंदु छौ।

सुख-दुःख क जाल म पोड़िक मनिखि उनिं ढले जौंद जनुं वेकु रौंणु-सैंणु रौंद। शंकुर बोडा तैं भूखु रौंण कि आदत सि पड़िगी छै ये कारण भूख रौंणु वूं कुंणि क्वी खाश परेशनि नि छै। कबि कबार क्वी काम मिल जौंदु छौ त, द्वी-चार पेसौं क दर्शन ह्वे जौंद छा अर बोडा क चुल्लु तैं आग की गर्मी कू बी अनुभव ह्वे जौंद छौ।

आज शंकुर बोडा तैं मेहनत मजदूरि की पगार मिली छै। ये कारण बाप- बेटा द्वी खैपी की सींण कि तैयारि म छा। पेट म द्वी रोटि जौंण से कुछ शान्ति छै मिली। ना समझ शनि तै अपंण बाबु कि दुख तखलीफ कु कुछ ज्ञान नि छौ। जैकू पेट भर्यूं रौंद वु भूख से अपरिचित ही रौंद। बाप-बेटा टुटीं सि खटोलि म पडिकी नींद की इंतजार छा करणै। एकाएक शनि न शंकुर बोडा पूछि दे, ‘बाबा जी, गुर्ख्यणि कि कथा तुमतैं बि च याद?’ परसि सदा ददा, न कथा सुणौंण कु वादा कै छौ पणि कै काम से वू कखि भैर चलिगी। बाबा जी, तुमी सुंणै द्या वी कथा तैं।

शंकुरु बोड़ा कु आज पेट भर्यू छौ, उकताहट क कारण नींद बि  नि छै औंणी। गुरुख्यों पर रोष दिखौंद वूंन बोलि, ‘अरे नाम न ले तौंकु। वूंक अत्याचार सूंणिकि आज बि डौर लगद। तेरु सदा ददा व सुंणी सुणैंई कथा ही सुणौंदु पंणि मेर ददा न त वु अत्याचार अपंण समंणि च दिख्यूं। जब कबि वू यी कथा सुणौंद छा त कति जननु क आंखु ऐ जौंद छा। कति मर्द गुस्सा म अंपण दांत खूट बुखौंण लगद छा। तेरि जिद च त सूंणि ले कथा, पंणि बीच म ही से नि जै।

बोडा न कथा शुरू करद बोलि, ‘तेर बूढ़ ददा बतौंद छा कि द्वी सौ साल पैली, नैपाल राजा कू सेनापति अमर सिंह थापा न गढ़वाल पर चढ़ाई कै छै। बेबरि नेपाल म गोरखा जाति कू राज छौ। अमर सिंह थापा न अपुंणु दगड्या चौतरिया की मदद से गढ़वाल म जु अत्याचार अर मारकाट मचै, वा आज बि हर एक गढ़वलि क मुख पर ‘गुरख्यणि’ नाम से लिहे जौंद। मेरु दादा बतौंदु छौ कि गुरख्यों न नादान बच्चा काटि दीं। पकीं खड़ि फसल उजाड़ दे। जननू क दगड़ बी बुरु व्यवहार करैगे। जौं लोगुम रुप्या पैंसा छा वूंन वू सुरक्षित भांडुद धैरि की खडारि दीं। वूंकि या सोच छई कि अगर बच्यां रै जौला त फिर काम आल। कति घर बौड़ नि ह्वे सैक वूंक खडर्यूं धन तनि रैगी या कै दुसर क हाथ लगिगी।’

अपंण बाबा तैं बीच म रोकि की शनि न पूछ,- ‘बाबा जी, हमर गौं म बि रै होला कैमु इतना रुप्या?’ ‘हां बेटा हां, मेर ददा जी वूंकु नाम ल्हेकि बुलद छा कि, जौंम एक हजार, चांदी का रुप्या हुंद छा, वूंकु तै ‘भड्डू सेठ’ बुलै जौंद छौ। हमर गौंम बि द्वी-तीन भडड़ू सेठ छा।’

बोडा न लंबि जमांई ल्हीद बोलि, ‘शनि अब भौत रात ह्वेगी अब से जौला।’ बोडा त कुछ ही देर म खुर्राटा ल्हीण बैठिगी, पंणि शनि की नींद, छज्जा म की सी घिडुडि फुर्र उड़ि की रुप्यौंन भर्यां भांडौ तै छै खुजौंणी। वेक आंखुक समंणी अब रुप्यौंन भर्या भांड ही छा नचणैं।

भगवान क घर देर च अंधेर नी। एक दिन वूंन शनि की मनोकामना पूरि कैरी ही दे। शनि सुबेर ही पांणि कु लुट्या ल्हे कि दिशा फिरागत कू भैर जौंणू छौ। तबी वेकि नजर एक जंगलि सुंगर पर पड़िगी। सुंगर कू अपंण थुंथर न काफि दूर तक पुंगड़ कू ढीस ही ढीस खण्यूं छौ अर अब वू कै भारि चीज तै उलटंण की कोशिश म छौ लग्यूं। तबि शनि कू फिक्यूं एक बड़ु सि ढुंग्यू सुंगर क थुबुड़ पर जोर से लगिगी। अचानक की यीं मार से सुंगर त धबरै कि भाग गे अर शनि तैं भाग्य की भताक से वु सब मिलिगे जैकि वेतै खाश जरूरत अर इच्छा छै।

जैं भारि चीज तै सुंगर उलटंणू छौ, वा रुप्यौं न भरी एक तांबा  कि गमरेटि छै। फिर क्या चहेंणू छौ। आठ नौ साल कु शनि, जेठ मैना कि औडल सी, मुठ्यूं थूक लगै घर पौछिगे। शंकरू बोडा वेबरि अपंणि चिलम छा भरणू। शनि तैं हंपद देखि वूंन पूछि, ‘क्या ह्वे त्वे तैं जु इतना धौकुंणु छै।’

शनि केवल इतना ही बोलि सैक, ‘बाब जी, दौड़िक चलु, निथर काम बिगड़ि जौलू।’ शनि की हालत देखी बोडा, चिलम तैं छोडिक शनि का दगड़ दौड़गे।

बाबु बेटा तैं जु धन वख मील वा भाग्य की एक भारि भताक छै। जैक कारण शंकुरू बोडा कू परिवार कति पीढ़ि तक चैन कि रोटि रै खौंणू।

श्री जगदीश देवरानी, नजीबाबाद
सन् 1955 से हिन्दी एवं गढ़वाली में लेखन कार्य

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