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Wednesday, May 25, 2022
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‘गूंगकि बलि’ – गढ़वाली कहानी

आज पंडित ब्रह्मानंद क चौक म तिरपाल छौ तड्यूं। द्वी चार कुर्सि अर कुछ चारपायूं म दरि बिछै कि बैठक सजई छै। बैठक म कुछ लोग, जौंमु मीं बि सामिल छौ, छ्वीयूंम मस्त छा।

पंडित ब्रह्मानंद क घर म आज देवि पाठ कु समापन छौ। पंडित सदानंद जी, पिछला पांच दिन बटी पाठ मा छा बैठ्यां। भितर पूजा हूंणी छै अर चौक मा छ्वीयुं कि रंगत छै अईं। तबी भितर बटी पंडित सदानंद जी कू आदेश ह्वेगी, ‘लगुठ्या ल्हि आवा’।

लगुठ्या ‘शब्द मेरि समझ म नि ऐ। कोस-कोस पर पांणि अर वांणि म बदलाव ह्वे ही जौंद। ये बदलाव क कारण मि पंडित जी कू मनतव्य नि समझि सैकु कि वूंन क्या मंगै? एक अध्यापक क नात मि कै तैं पूछि की अपंणी मूर्खता कू प्रमाण-पत्र बी नि दे सकदु छौ। चुपचाप रौ बैठ्यूं पंणि जिकुड़ि म उठा-पोड़ छै मचीं।

मेरि या उठा पोड़ तब शान्त होय जब एक आदिम, बुगठ्या की जूड़ि थांमि चौक म ऐगी अर फिर पंडित जी तैं पूछि, ‘पंडित जी, लगुठ्या ऐगी, कख बंधण वू? ‘अब मि समझि ग्यूं कि ‘बुगठ्या’ को ही नाम च ‘लगुठ्या’। अर पंडित जी की यी मांग छै। अब मन की उठा-पोड़ शान्त ह्वेगी छै। पंडित जी क आदेशानुसार, एक खाश जगा पर ‘लगुठ्या’, बंधेगी अर भ्यूंल कि द्वी हैरि फौंगि, वेक समांणि वेतैं बिळमौंण क डलैगी काल बि मनिखि तैं इनि बिळमै कि लिजौंद।

भितर पूजा फिर शुरू ह्वेगी। पंडित जी को मंत्रोचारण भैर चौक म सुणेणू छौ। कुछ देर बाद वूंन ब्रह्मानंद तै भितर बुलै अर वूं तैं क्वी काम बतै कि फिर अपण काम पर लगिगीं। ब्रह्मानंद क परिवार कू सबी लोग एक क बाद एक चौक म जमां ह्वेगी। सदानंद जी पिठै की थालि अर जल पात्र ल्हेकि भैर ऐगी। सबतैं आचमन करैकि, रोलि कु तिलक करै, वूंतैं वी जगा मा बुलैगी जख देवि कू सुन्दर चक्र छा बण्यूं। अलग-अलग रंगू म रंगी वा अल्पना सचमुच ही दिखण लैक छै। ‘लगुठ्या’ बी वखी लयेगी। अब सिर्फ गबरू की इंतजार छै। गबरू उर्फ गबर सिंह, ‘लगुठ्या’ की मौण उडांण म माहिर छौ। थमलि कि एक छपालक म लगुठ्या की मोंण दूर जैकि पड़दि छै।

गबरु कू बेसबरी से इंतजार छौ हूंणू। वेक बारा मा लोगु कु अलग-अलग बुलंणू छौ। कैन बोलि कि वु बाजार जौंद दिखे अर कैन वू गोरूम जौंद देखि। ब्रह्मानंद कुछ परेशान सि छौ फिर बी गबरू पर वूंकू पूरू विश्वास छौ।

लोगु म खुशफुसाट चलंणू ही छौ, तबि हाथ म धारदार, भारि थमलि थामि गबरू ऐगी।

पंडित सदानंद न गबरू तैं बुलै अर वेमुं कुछ बोलि। गबरू हाथ खुट ध्वे क फिर वूंक समंणी खड़ू ह्वेगी। पंडित जी न वेकी तिलक करी, वै की थमलि पर जल पात्र कू मंत्र्यूं पांणि छिड़िकी दें। लगुठ्या की जूड़ि खोलि, वे तै चक्र क समांणि लयेगी। वेकि बि तिलक करेगी अर पूजा को प्रसाद वेक मुख डलेगी। यु एक संकेत छौ कि अरे गूंग! आज बटी यी धरती कू अन्न-जल, त्वेकू कोप ह्वेगी अर यु तेरू आखरि गप्फा च।

परिवार क सब लोगुन, जल, तिल की ज्यूंदाल, मंत्रोचारण का बाद, लगुठ्या पर छिड़िकि दे। भीड़ से घिर्यूं, घबरयूं लगुठ्यां कि आंखी इनैं उनैं छै टपरौंणी। वु बोलि सकदु त कैतै जरूर पुछदू कि यु क्या च हूंणू।

आज इनीं कति जीव छना, जु बोलि नि सकद या जौंकि बुलीं तै क्वी बि नि सुंणद, वूं कि स्थिति बी ये लगुठ्या से कै बी रूप म कम नी च।

अपण हाथु से ज्यूंदाल छिड़की, सब लोग हाथ जोड़ी खड़ा छा। वूंकी नजर अब लगुठ्या क गात पर छै टिकी। वेन जब गात तक नि हिलौयु, त सदानंद न अपंण जजमान ब्रह्मानंद पूछि दे, ‘तुमरू क्वी उठंणु त नि छौ गड्यूं, भूल चूक बि ह्वे जौंद कबि। सवा रुप्या निकाल अर अपंण पितुर याद करिल्या। क्या पता कैकि क्वी गांसि रयीं ह्वा। ब्रह्मानंद क मुख पर छई उदासि साफ दिखेंणी छै। वूंन तुरन्त सवा रुप्या दंड धैरि, हाथ जोड़ि, पितुर से भूल-चूक की माफी मांगि दे।

ये बीच पंडित जी न अंजुलि भोरि पांणि ले अर लगुठ्या क कंदुडु अर गात पर जोर से छिड़िकि दे जै गंूग तैं ठंड से बचौंण कू, वे दयालु कि, लटुलु कि सौगात दिईं च, वेक कंदुड़ु अर गात पर ऐड़ु पांणि छिड़की कि तुम अपंण द्यबता मनौंणै छौ, यु काम कख तक सहि च, यु सुचुंणु जरूरी च।

लगुठ्या क गात पर ऐड़ु पांणि लगद ही वेतै जरा कंपकपी ह्वे अर वेन गात झिंगरै दे। लोगु कु मुखवटि देविक जयकारा छा अर गबरू क हाथ म छै पैनि थमलि लगुठ्या कु ग्वालु अबि गिच्च ही छौ कि ‘छप्प’ की ध्वनि का दगड़ वेकि मूंण, दूर पड़िगी, इनै वेक खुट्टा छा छटपटौंणै।

या छै एक गूंग की बलि। प्रश्न यू च कि आज कु सभ्य, शिक्षित समाज, इनु कति गूंगू की बलि विषय पर क्यों नि सुचंुणू अर वी पुरणि पाशुविक प्रवृत्ति पर रोक किलै नि लगौंणू?

श्री जगदीश देवरानी, नजीबाबाद
सन् 1955 से हिन्दी एवं गढ़वाली में लेखन कार्य

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