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Wednesday, May 25, 2022
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तिसाळि नदी – गढ़वाली कहानी

ये वैज्ञानिक युग म भलै क्वी भाग्य तैं नि मानों पंणि मनिखि ही न, धरती कू हर जीव, भाग्य क हाथ कू एक खिलौना च।

‘तिसलि नदी’ नामक यीं कहानि म मेरू यी प्रयास रै कि मि भाग्य अर दुर्भाग्य कु असर मनिखि समाज क सामंणि प्रस्तुत कै सैकु। कहानि दयाराम क परिवार से जुड़ी च।

गौं म दयाराम को एक सुखी परिवार छौ। सीमित परिवार क कारण क्वी आर्थिक झंझट नि छै। कुन बी वू पैत्रिक  धन कू धनी छौ। परिवार म सबसे बड़ी नौनी, ‘ममता’ कू ब्यौ ह्वेगी छौ। वा अपंण ससुरास छै। वींकि पीठि क सुरेश अर महेश द्वी भाई छा। बड़ु भाई सुरेश, दिल्ली की एक प्राइवेट कम्पनी म लग्यूं छौ। इण्टर पास कैकी महेश बी गढ़वाल राइफल म भर्ति ह्वे की रुड़कि चलिगे छौ। घर म दया राम, वेकि घरवलि गंगा अर सुरेश की ब्वारी पूजा, तीन ही प्रांणि छा।

कारगिल म दुश्मन जरा जरा कै अपुंणु दबाव बढ़ौणूं छौ। ये कारण वख गढ़वाल राइफल की एक कम्पनि तैनात ह्वेगी। महेश वी कम्पनि म ही छौ। अपण ब्यौ म वू वख बटि ही एक मैना की छुट्टि म घौर अयूं छौ। वेक ब्यौ हुयां अबि एक हप्ता  बि नि ह्वे छौ कि कारगिल म लड़ै छिड़गी। छुट्टि पर जयां सबि सैनिक वापिस बुलये गींन। महेश बी, जैक हाथ की हल्दि बी नि मिटी छै, कारगिल पौंछिगी। नई-नई ब्योलि सरिता न त वेकी सूरत बी ढंग से नि देखी छै।

मनिखि न शास्त्र पुराण सबि पढिन पंणि भाग्य कैन नि पढ़ि सैकु। महेश क भाग्य म क्या लिख्यूं कैतैं पता नि छौ। वु खुद नि जणदु छौ कि वेकु भाग्य वेक दगड़ इनु खिलवाड़ कैरलू अर वख जौंद ही वु शहीद ह्वे जौलु। महेश त दुन्या छोड़ी ही चलिगे छौ, अब यु एक आम प्रश्न छौ कि सरिता कू क्या होलु। वा अपुणु बोझ सी जीवन कैक सार काटली?

दयाराम क दुखी परिवार म हाहाकार मच्यूं छौ। गौं म बी भारि शोक छौ छयूं। हिन्दु समाज अर खाश कर उत्तराखण्ड म नारी कू विधवा हूंणू एक बड़ू अभिशाप मने जौंद। सब की गीलि आख्यूं म अब सरिता ही नजर छै औंणी।

मनिखि बड़ु सि बड़ु दुख सै ल्हींद पंणि पेट की भूख नि सै सकदु। या भूख मनिखि की सबसे कमजोर नब्ज हूंद। यी भूख क कारण वू भलु, बुरू कुछ बी नि दिखदु। दयाराम कू परिवार बी अपंणि भूख मिटौंण कू जरा-जरा कै जीवन की पटड़ि पर छौ उतुरंणू। सरिता की बात कुछ अलग छै। ज्वन्नि की पैलि सीढ़ि म चढ़द ही वीतैं जु ठोकर लगि छै वेकु घाव कबि नि मौलि सकदु छौ। मेहंदी कू रंग अबि हथ खुटं् पर ही छौ कि वी पर वैधव्य की महामार पड़िगी छै।

भूखु मनिखि कुछ देर भूख सै सकद पंणि अधपेटु नि सै सकदु। अधरवयूं भोजन कु स्वाद वे कि जीभ म बार-बार औंण रौंद। सरिता क बी कुछ इनूं ही हाल छा। वा बि अघपेटि छै। भूख क कई रूप हुंदी, पंणि मन, धन अर रूप की भूख अपुंणु विशेष स्थान रखदीं। तीस क बी यी लक्षण छिन। तन की तीस मिट जौंद पंणि मन की तीस अच्छु खाशु ठंडु मीठू, स्वादिष्ट शरबत पे कि बि नि मिटदि। नदी की खुकुलि म अथाह जल राशि रौंद फिर वि वा सागर म मिलि की ही अपंणि तीस बुझौंद। सागर की लहर रूपी बौल्यूं म रंगरैलि मनैं कि ही वींकि तीस मिटद। यू बी एक शारीरिक संबंध च।

सरिता कू यु संबंध भले टूटिगी छौ। फिर बी वींकि तीस अधूरी ही छै। वा अगर नदी क समान ही स्वछंद अर समर्थ हूंदी त अब तक कै न कै सागर की स्वस्थ बौल्यूं म रौंदि खिलंणी। वा त पुरुष प्रधान समाज रूपी भयानक भूत से भयभीत छै।

भाग्य अदृश्य हूंद। आज दिन तक क्वी वेकी चाल ढाल नि समझ सैकू। पल भर म वू सब कुछ करण म समर्थ च। एक दिन सरिता, गौं की धसेर्यूं दगड़ बूंण छै जईं। वख, वीकी भेट दीपा से ह्वेगी। दीपा, दीपक की दीदी छै। दीपक अर सरिता एक ही स्कूल म पढ़द छा।

द्वियूंम खूब घनिष्टता छै। ये कारण द्वियूंकु एक दुसर क घौर औंणु-जौंणु छौ। तबी दीपा अर सरिता की आपसी जांण पछ्यांण छै। नजदीकी ससुरास क कारण आज बूंण म वूंकी मुलाकात ह्वेगी छै।     दीपा, सरिता तैं कुछ धैर्य दींदी, यां से पैलि ही सरिता न दीपा पूछि दे, ‘दीदी, आजकल दीपक क्या च करणू। कखि वे कि नौकरि लगि बि च?’

दीपक शब्द क उच्चारण मात्र से सरिता कू सुख्यूं मुख पर रौनक ऐगी छै। दीपा वींक भाव तै समझंणी छै। वीन सरिता म बोली, ‘दीपक तै सरकरि नौकरि पर लग्या चार मैना ह्वेगी, तनख्वा बि अच्छि च, पंणि ब्यो क नाम से भौत चिढ़णू। डेड मैना कि छुट्टि पर घौर ही च अयूं। बाबा जी बच्यां हूंद त जोर जबरदस्ति करद बी, चचा जी त अपुण फर्ज ही निभौणै छिन।’

दीपक क बारा म, इनुं निराशाजनक शब्द सूंणि की सरिता और दुखी ह्वेगी। अब वा इनुं बि सुचंणी छै कि मेर कारण ही त दीपक ब्यौ नि करंणू या कखि विधाता कू ही हम द्वियूं कु रिसता नि ह्वा मंजूर कर्यूं? निथर वेकु ब्यौ नि करण कू और क्या कारण ह्वे सकद?

कुछ देर तक बात करंण क बाद द्वी काम पर लगिगी अर रूम्क पड़न से पैलि घास ल्हे कि घर पौछि गैं। सरिता क मन म अब दीपक ही बस्यूं छौ। वींकी रातू की नींद उड़िगी छै। ‘वु ब्यौं किलै नि करणू, यु सवाल सौंण कि कुयेड़ि सि वींकि जिकुड़ि म छौ लौकुंणू।

कैक बारा म क्वी कतुकु दुखी रौंद, यी अपणत्व की एक पछ्यांण च। यूं कारणो से दुखी सरिता न दीपक से मिलंण कू अंतिम फैसला करिदे। वा वेकी मन की सुंणन अर अपंण मन की सुणौण चौंदी छै। या वींकी प्रवल इच्छा छै। सच्ची चाह तै राह बी मिलि ही जौंद। बाजार जईं सरिता तै एक दिन दीपक मिलि ही गे। यी आकस्मिक मुलाकात से द्वियूंक मुख पर एक हल्कि सि मुस्कराट छै।

दीपक न प्यार क अंदाज म सरिता कू हाथ थाम अर समंणि ही चाय की दुकान म ल्हीगे। चाय समोसा कू आदेश दे की वू सरिता क काख पर ही बैठिगी ताकि बार-बार वींकु मधुर स्पर्श हूंणू रौ। वे तैं सरिता क साथ हुई दुर्घटना कू पुरु ज्ञान छौ। पंणि अपंणि थीं सुखद मुलाकात की मीठी याद तैं वु खटास म नि बदलुंणू चौंणू छौ। दुकानदार, चाय-समोसा धैरिक चलिगी।

सरिता, ज्वा कुछ देर कू अपुंणु दुख भूलिगी छै। चुटकि ल्हींद बोली, ‘दीपक, अच्छी खाशि सरकरि नौकरि मिलण पर बी, यी च तेरि दिईं दावत। मेरि त कुछ और ही छै सूचीं। हां भई, औंण वलि ब्योलि कि फिकर ह्वेगी होलि। वीं कुंणि ही ह्वेलु जमा करणू।’ द्वियूंक मुख पर हंसि छै मुलकुंणी।

चाय क बीच म ही सरिता न दीपक पूछि दे- ‘दीपक, अब पौंणै, कब छै खलौंणू। क्वी मन पसंद परि मीलि गी या नि मीलि?’ सरिता कू हाथ दबौंद दीपक कू उत्तर छौ, सरिता मितैं जै परि की तलाश छै वा आज मेर ही काख पर बैठीं पंणि भाग्य तैं बी ह्वा जब मंजूर?’

दीपक की मन की थाह ल्हींद सरिता बोली, ‘दीपक अब पिछलि सबि बातूं तैं भुल जा। अब सब कुछ बदलेगी। मिं अब एक जुट्ठि पतल छौं। जैंतै, कौवा, कुकुर अर सियार ही चटद। मितैं भूलि जा अर अपंणि दुन्या बसै ले। तु खुश रै, मेरी यी कामना च।’

 सरिता की यीं भावुकता न दीपक क आँखु म आँसूं की बाढ़ सी ऐगी। रूवांसु स्वर म वेन बोली, ‘सरिता तु खूब जणदीं कि गौंकि मैलि रौलि खौल्यूं कु पांणि ही नदी की शोभा बढ़ौंद। विशाल सागर फिर बी वीं नदी तैं अपंण दिल म जगा दींद। तु आज बी मेर वास्त, फूल की वी अछूती कूंपल छै। ये से जादा बुलंण कि शक्ति अब मीं पर नीं।’ वेक बचनू म विश्वास भर्यूं छौ। ‘दीपक यु क्वी बच्चौ कु खेल नीच, हमरू जीवन को सवाल च। ये वास्त हम तैं सोचि समझिक ही कदम उठौंण चैंद जैसे बाद म पछतौंण नि पोड़ दीपक की मन की गहराई नपंण कू यू सरिता कू दुसुरु प्रयास छौ।

 दीपक कु संक्षिप्त उत्तर छौ, ‘सरिता, तेर दिल की त्वी जांणी, पंणि मीं यी भरपूर ज्वन्नि की सौगंद ल्हे कि बुलुंणू छौं कि जु तीन मितै ठुकरै दे त, मिंन जीवन भर ब्यौ नि करंणू। इनुं बुलद वेकु गौल भरेगी। आंसू की नदी बगंण लगिगी।

दीपक की इनुं प्रतिज्ञा सूंणी सरिता भाव विभोर ह्वे की दीपक पर लिपटिगी। वी तैं इनुं ध्यान बि नि रै कि वा एक दुकान का भितर च। जख वीं पर कत्यूं कि नजर च टिकी। प्रेम हूंद ही अंधु च। दीपक सरिता तै भैर ल्हिऐ। सरिता न, गुपचुप शब्दू म दीपक का समंणी अपंणी योजना रखिकी, वे तैं समझै बुझै की, दुखि मन से वेतै विदा कैकी, वा बी घौर ऐगी। 

सरिता, दीपक क दगड़ कर्यूं वादा तैं जल्दि ही पूरू करंण कि कोशिश म छै। भाग्य, परिस्थित्यूं तैं अपंण अनूकूल बंणै दीद। सरिता, एक दिन, अपंणि सासु, गंगा कू मुंडु छै बधंणी। तबि सरिता की रीति हथेल्यूं पर गंगा की नजर पड़िगी। माँ कि ममता उमिड़िगी। अब वींक आँसु म आँसु किगाड़ छै बगंणी। दुखी मन से सरिता न बोलि, ‘मांजी, तुम किलै छौ दुखी हूंणैं। तुमरु सारु त पक्कू च, एक छोड़ि द्वि द्वि सारू छिन। रूंणु त मेर भाग्य म च लिख्यूं, जैं तैं क्वी बि सारू नजर नि औंणू। न मैत न ससुरास। इनुं आंसु धोलिकि मेरि रईं सईं कमर तैं न तोड़ा।’

गंगा पढ़ी-लिखी त नि छै पंणि बात कि गैराई तै खूब समझदी छै। सरिता कु दुख वीन अपंुणु दुख बंणै दे छौ। सरिता क इनूं वचन सूंणि वीन बोलि, ‘बेटी मेर दिलक घाव म तु इनूं लूंण न लगौ। तेरू दुख हमरू ही दुख च। हम तेर तै भाग्य से लड़ि त निसकद पंणि इनु राय दे सकदौ जैसे तु अपुंणु भलु-बुरु सोचि कि सुखी जीवन बितै सैकि अर हम बि तेरि खुशि म शामिल ह्वे सकौं?’

अपणि सासू क यूं बचनूं तै सूंणि की सरिता क दुखि मन तै थोड़ा भौत चैन कू आभास ह्वे। वीन अपंणि योजना तैं सफल हूंद देखिकी तुरंत ही दीपक तक खबर देदे अर तय दिन पर देवी क मंदिर म बुलै दे।

शाम कू समै छौ। भोजन करण क बाद, दयाराम तिवरि म हुक्का, गुड़गुड़ौंणू छौ, सुरेश कि ब्वारि ‘पूजा’ सींण कि तैयरि करणी छै। तबि सरिता न, दीपक क बार म सब कुछ बतै दे। गंगा दीपक क पूर परिवार से परिचित छै। ये कारण वींतै सरिता की योजना पसंद ऐगी, दयाराम न बी विरोध नि कै। तय दिन पर सरिता, गंगा अर दयाराम मंदिर पौंछिगी। कुछ देर म दीपक बी अपंणि माँ ल्हेकि ऐगी। द्वी पक्षु म रामारूमी क बाद, दीपक अर सरिता तैं अपंणि आशीर्वाद दे की, सरिता कू हाथ दीपक तै थमैं दे।

श्री जगदीश देवरानी, नजीबाबाद
सन् 1955 से हिन्दी एवं गढ़वाली में लेखन कार्य

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