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Wednesday, May 25, 2022
कहानियां हिंदी कहानियां हिन्दी कहानी: कटखनी बंदरिया

हिन्दी कहानी: कटखनी बंदरिया

कटखनी बन्दरिया से मेरी जन्म जात दुश्मनी थी उससे मेरी जन्म से ही नहीं बनती थी। जहां भी मुलाकात होती निश्चित रूप से झगड़ा हो उठता था। कटखनी बन्दरिया और मैं साथ-साथ झगड़ते-झगड़ते बड़े होते चले गये। इस समय हम दोनों किशोरावस्था पार कर रहे थे।

कटखनी बन्दरिया का घर वालों ने नाम रखा था ज्योति। मेरे को वह बेहूदी भद्दी ही नजर आती थी। जब से बचपन में एक दिन झगड़े में उसने मेरा हाथ काट खाया था तब से ही मैं उसे कटखनी बन्दरिया ही पुकारता था तथा मुझे वह बन्दरिया ही नजर आती थी।

वैसे और दूसरे लोग कहते थे कि ज्योति गजब की सुन्दर है लंबी छरहरी देह, बड़ी-बड़ी आंखें, मोतियों जैसे दाँत, सुकोमल लंबी नासिका, सुराहीदार गर्दन, साफ स्वच्छ चेहरा, पतली कमर, जाने क्या कहते थे लोग बहरहाल मेरी नजर में बन्दरिया बन्दरिया ही होती है बन्दरिया का सुंदरता से कोई सम्बन्ध नहीं। ज्योति मेरी बातों के जवाब में मुझे ‘ऊँट’ कहकर सम्मानित करती थी उसकी नजर में मेरा अस्तित्व व्यक्तित्व ऊँट जैसा था। लोगों के कथनानुसार मैं लम्बा छरहरा दुबला पतला शरीर वाला मोटी-मोटी आंखों वाला खूबसूरत व्यक्तित्व वाला नौजवान होने जा रहा था परन्तु ज्योति का कहना था कि लम्बे ऊँट के चेहरे पर बड़ी सी पकौड़ी जैसी नाक के रहते भी कोई खूबसूरत होता है? ज्योति ने हमेशा मेरा मज़ाक ही उड़ाया था बदले में मैने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मेरी तो तमन्ना थी कि जब भी उसके के लिए कोई ऐसा रिश्ता आये- कि उसको मिलने वाला लड़का आड़ा तिरछा भैंगा काला कलूटा टिड्वा जैसा हो तो मजा आ जाये।

और आज जब ज्योति के लिए जो रिश्ता आया- उस लड़के को मैंने देखा-औसत लम्बाई साफ नयन नक्श कुल मिलाकर सुन्दर ही नजर आ रहा था। जाने क्यों उसे देखकर मैं उससे अपनी तुलना करने लगा था कि अचानक मैंने महसूस किया कि उसके लिए यह लड़का उपयुक्त नहीं है। उसके लिए काला कलूटा आड़ा तिरछा टिड्वा भैंगा लड़के की तो मैं कल्पना ही करता था परन्तु आज मुझे महसूस होने लगा कि ज्योति को तो मेरे सिवाए किसी और लड़के को पसन्द करने का अधिकार ही नहीं है। ये मुझे क्या हो गया था मुझे नहीं पता… मैं व्यग्र हो उठा…ज्योति कहीं इसे पसन्द न कर ले। मैं बेचैन होकर अपने घर में ही करवटें बदलने लगा।

दीपा ज्योति की सहेली थी। उसको देखने आये लोगों के साथ ज्योति ने कैसा बर्ताव किया मुझे ये सब दीपा ने अक्षरशः बताया। दीपा ने बताया कि ज्योति ने लड़के को देखकर साफ इन्कार कर दिया उसके घर वालों ने कारण पूछा। ज्योति खुले दिल किसी से कुछ भी न छुपाने वाली न किसी से डरने वाली शख्सियत थी। उसने साफ शब्दों में दीपा सहित अपने घरवालों को बता दिया कि मेरी शादी होगी तो…उसी ऊँट से जो मुझे बन्दरिया कहता है नहीं तो किसी से भी मुझे शादी ही नहीं करनी।

मैं अचानक आनंद के सागर में हिलौरे लेने लगा था मुझे सारा जहां आकाश सभी कुछ अति सुन्दर साफ स्वच्छ नजर आने लगा।

फेरे हो रहे थे मेरे और ज्योति के, वेदी में दूल्हा सर्वप्रथम दुल्हन का अगूंठा पकड़ता है। पंडित ने मुझसे दुल्हन का अगूंठा पकड़ने को कहा- कटखनी बन्दरिया घूंघट की ओट से ही मुझे बड़ी देर से परेशान कर रही थी। मुझे मौका मिला- मैंने खूब जोर से उसका अगूंठा पकड़ लिया। वह बहुत कसमसायी मगर अब मैं चूकने वाला नहीं था। पंडित फिर मन्त्रोचारणों आदि में ही उलझ गये थे। मैंने अंगूठा नहीं छोड़ा ज्योति बहुत कसमसा रही थी। मैं खूब जोर से उसका अंगूठा दबोचे रहा शायद अगूंठा सूज भी गया हो। बड़ी देर बाद ज्योति के कसमसाने पर पंडित का ध्यान हमारी तरफ हुआ।

‘अबे…छिका मुर्गा…तेरा अभी तक अगूंठा पकडा ही हुआ है’ पंडित भी गाली देने में कटखनी बन्दरिया का चाचा ही था।

‘आप ने तो कहा था…मैंने पकड़ लिया’

‘अबे मैंने ऐसे थोड़े कहा था कि इसको छोड़ना ही नहीं, चल छोड़…छिका मुर्गा कहीं का’ पंडित जी ने मुझे आशीर्वाद दिया मैंने अंगूठा छोड़ दिया।

प्रथम मिलन पर कटखनी बन्दरिया एकदम मुझ पर झपट सी पड़ी उसके मुक्कों की बौछार मेरी छाती पर होते रहे ऊँट हो …. मेरा अंगूठा ही सूजा दिया और फिर वह मेरे हृदय से आ लगी थी।

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