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Wednesday, May 25, 2022

चूल्लू भर पानी

दोस्तो, आज मैं आपको एक ऐसे दफ्तर ले चलती हूँ, जहाँ एक चूहा मुजरिम के कटघरे में खड़ा सज़ा-ए-मौत की प्रतीक्षा कर रहा है।

कहने को वह चूहा है। सूक्षम शरीरधारी क्षुद्र जंतु, किंतु उस छोटे-से शरीर के भीतर बुद्धि ऐसी विद्रोही है कि बड़े-से-बड़े देशद्रोही की क्या होगी ! अपनी प्रखर क्षमता के चलते उसने इस दफ्तर में इतना भयानक उत्पात मचा रखा था कि पूरा भवन तहस-नहस होने के कगार पर पहुँच गया था। आप तो जानते हैं कि उग्रवादी के आगे अच्छे-अच्छे शक्तिशाली बल हथियार डाल देते हैं। यहाँ भी वहीं हुआ। दफ्तर की कमान सँभालने वालों ने उसके आगे हथियार डाल दिए थे और उसे ‘सुपर कमान’ के रूप में स्वीकार कर लिया था।

वह सचमुच सुपर सिद्ध हुआ। अपने आसपास फैल क्षुद्र इंसानों में ही नहीं, बल्कि अपनी बज्रदंती जाति के चूहों में भी अतः फ़ाइलों से लेकर पर्दों, बर्तनों तक और फ़र्नीचर से लेकर दरवाजों, खिड़कियों तक को अपने मोती दातों का निशाना बनाने लगा। अगर वह फ़ाइलों को ठीक जहग से कुतरता (जहाँ अपेक्षित था) तो किसी के लिए दिक्कत की बात न होती, लेकिन वह दुष्ट पूरे-के-पूरे पृष्ठ इस तरह साफ़ कर देता कि सबूत के लिए एक भी कुतरन शेष न बचती। ऐसे में चूहे की कारस्तानी के लिए चूहे को दोष देना संभव नहीं था। उलटे स्टाफ में कइयों की नौकरी पर ख़तरनाक बादल मँडराने लगे थे।

हमारे देश में आपदा दरवाजे़ से भीतर आ जाए तो आपातकालीन बैठक बुलाने का रिवाज़ है। अंततः दफ्तर में भी यह सत्कर्म संपन्न हुआ और आनन-फानन में बैठक बिछ गई। इसमें चूहे की कमीनी कारगुजारियांे को सिलसिलेवार लिखने के बाद तय पाया गया कि जिस दफ्तर की मिट्टी में उसका जन्म हुआ था और जिसके अन्न-जल के सेवन से वह इतना हृष्ट-पुष्ट बना, उसी दफ़्तर की थाली में जगह-जगह छिद्र कर नष्ट करने के अपराध में उसे गद्दार और कृतघ्न क्यों न घोषित किया जाए और फिर उसे वही दंड क्यों न दिया जाए, जोकि एक देशद्रोही को दिया जाता है। सज़ा-ए-मौत!

हालाँकि न्याय की दृष्टि में बिना सबूत के किसी को मुजरिम मानना असंगत है, किंतु जहाँ अपराधी स्वयं सबूत साथ लिए उद्दंडता से घूमता हो और किसी की दृष्टि पड़ते ही झट ओझल हो जाता हो, वहाँ न्याय करने के लिए कानून का लचीला होना आवश्यक है। अतः कानूनी कार्यवाही के लिए चूहे का उपस्थित रहना मुकदमा चलाना अनावश्यक समझा गया। इसलिए उसे मुजरिम घोषित करने के साथ ही उसकी गिरफ्तारी का वारंट निकाला गया। जिंदा या मुर्दा…।

तो जी, युद्धस्तर पर उसे पकड़ने के प्रयास आरंभ हो गये। सबसे पहले इसके बिलों के आस-पस कीटनाशकों का छिड़काव किया गया कि शायद इसी आसान तरीके बात बन जाए, किंतु चूहे की प्रतिरोधक क्षमता इतनी क्षीण नहीं थी कि ज़रा-सी छींटाकशी भी बर्दाश्त न कर सके, अतः वह पकड़ा न जा सका और पहला प्रयास असफल रहा।

इसके पश्चात् ज़हर बनाम आटे की गोलियाँ बनाई गईं और उन्हें शुद्ध देशी घी में डुबोकर कोनों-कोनों में रख दिया गया। पर आश्चर्य कि गोलियों के ग़ायब होने के बावजूद चूहे का छली अस्तित्व बना रहा। यानी उसकी झलक कहीं-न-कहीं लोगों को दिखती रही। किसी ने खिसियाकर गाली दी, ‘कम्बख्त के जिगर पर किसी ज़हर का असर ही नहीं होता। एकदम नेताओं वाला हाजमा पाया है।’

दो उपाय असफल हो गए तो चूहे को हिरासत में लेने के लिए कहीं से बिल्ली उधार लाई गई। वह आते ही सक्रिय हो गई और कभी किसी तो कभी किसी बिल पर लगातार छापे मारती रही, लेकिन उस धूर्Ÿा ने अपना असली घर न जाने कहाँ बना रखा था, जो जरा-सा ख़तरा महसूस होते ही उसे अपने में छिपाकर बचा लेता। अंत में किसी को बताए बिना बिल्ली दबे पाँव वाप चली गई। शायद खुद पर शर्मसार थी।

अब क्या किया जाए! मजबूरन फिर बैठक बुलाई गई। एक से बढ़कर एक डिग्रीधारी हार चुके थे अतः इस बार सबसे कम शिक्षित कर्मचारी से राय ली गई। उसने तत्काल सुझाव पेश किया कि क्यों न बाजार से एक चूहेदानी ख़रीदकर लाई जाए और उसमें पनीर, पेस्ट्री, बिस्किट और पैटीज़ वगैरह वे सब स्वादिष्ट चीजें़ एक साथ रखी जाएँ, जिन्हें उस नामुराद ने अब तक की जिन्दगी में कभी देखा भी नहीं होगा। (यद्यपि ऐसे नामुरादों में इंसान भी आते हैं, किंतु इंसान इंसान है और जानवर जानवर) निस्संदेह यह उपाय मनोवैज्ञानिक था। अवश्य चूहे ने सोचा होगा कि सारा जीवन जिनकी कामना में तड़पते हुए बीता, उन्हें इस तरह अपनी पहुँच के भीतर सुलभ देख मौत से क्यों डरा जाए ! एक दिन मरना तो है ही। अतः वह हँसते-हँसते चूहेदानी में कै़द हो गया। खटाक…..!

अब जबकि मुजरिम कटघरे में क़ैद है तो उसे सज़ा देने के तरीके पर बैठक बुलाई गई है। सज़ा क्या दी जाए, यह तय है, पर कैसे दी जाए, यह सोचना है। इंसान की हमेशा से यही समस्या रही है। अक्सर उसे मालूम रहता है कि क्या करना है, मगर उलझन इस बात को लेकर बनी रहती है कि कैसे करना है !

अतः इस समय बैठक शबाब पर है। दफ्तर के अलग-अलग विचारक दंड देने के अलग-अलग तरीके तर्क-सहित प्रस्तुत कर रहे हैं। चंद चुनिंदे नमूने आप भी देखिए –

 तरीका नं. एक – जिस तरह कोई खाने वाली थाली में छेद करता है उसी तरह चूहे ने दफ्तर में रहकर उसे खोखला करने की भरपूर कोशिशें कीं। अतः उसके लिए उचित दंड यही है कि उसे कटघरे से बाहर निकालकर खुले आसमान के नीचे छोड़ दिया जाए ताकि कोई उड़ता हुआ शत्रु उसे अपना आहार बना ले। तब उसकी समझ में आएगा कि जिस भवन की सीमा में वह अब तक इतना सुरक्षित और निश्ंिचत था, उसी में जगह-जगह छिद्र बनाने का यह अंजाम है।

स्वभावतः हर तर्क का एक कुतर्क होता है, अतः उपर्युक्त उपाय के पालन में यह आशंका प्रकट की गई है कि कहीं खुले आसमानर के नीचे छोड़ने और बाहरी शत्रु के आने के बीच अपराधी को इतना समय न मिल जाए कि वह मौक़ा पाकर भाग निकले। जब पिंजरे में बंद कै़दी शस्त्रों से सुसज्जित बलवान सिपाहियों को चकमा देकर भाग सकते हैं तो इस चुस्त चालाक चूहे का क्या भरोसा !

तरीका नं. दो – मुजरिम चूहे को तेज़ जहरीजा पदार्थ दिया जाए ताकि इसे एहसास हो कि अपने कहर से जो ज़हर इसने दफ्तर की नस-नस में घोल दिया था, वह अंत में इसे ही लील गया। इस तर्क को भी एक कुतर्क ने यह याद दिलाते हुये काट दिया है कि पहले भी इसका दुरुस्त हाजमा देख चुके हैं।

तरीका नं. तीन – जिस तरह यह नामाकूल चूहा अपनी काली करतूतों से अनेक भलेमानसों का खून खौलाता रहा उसे देखकर यही उचित है कि इस पर खौलता हुआ तेल डाला जाए ताकि इसे अपने कर्मों का अहसास तो हो। फिर एक कुतर्क सिर उठाता है। इस तरह की मौत में अहसास कहाँ होगा ! इसमें तो बस फटाफट मौत होगी।

अंत में वहीं अल्पज्ञ कर्मचारी निवेदन करता है कि एक छोटे से चूहे को दंड देने के लिए इतना विशाल आयोजन न किया जाए तो अच्छा, क्योंकि इससे उसके शहीद हो जाने का ख़तरा है। यह तो हो नहीं सकता कि इस दफ्तर में आकर उत्पात मचाने वाला यह चूहा आखि़री सिद्ध हो। अभी न जाने कितने गद्दार अवसर की तलाश में छिपे बैठे होंगे। अतः यही ठीक रहेगा कि उस पर पानी डाला जाए यानी डुबोकर मारा जाए। यों तो उसे अब तक शर्म से डूब मरना चाहिए था, किंतु उसके लिए एक चुल्लू पानी काफ़ी होगा। क्यों दोस्तो, आपकी क्या राय है ! क्या उस जैसे के लिए चुल्लू-भर पानी पर्याप्त है ?

डॉ0 आशा रावत, देहरादून
एम.ए. (राजनीतिक विज्ञान, हिन्दी), बी.एड | पी.एच.डी.‘हिन्दी निबंधों में सामाजिक चेतना’ पर शोध।

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