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Monday, January 30, 2023
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डॉक्टर झटका – हिन्दी कहानी

मेरे शहर में एक चिकित्सक हैं – डॉक्टर झटका। जी नहीं, वह बाल-पत्रिका ‘लोटपोट’ वाले डॉक्टर झटका नहीं हैं पर शायद अंतर्मन में उनसे प्रभावित, उनका आभास कराने वाले और किंवदंतियों में चढ़े डॉक्टर झटका हैं। ऐसा नहीं कि उनकी अर्हता में कोई कमी हो। वे लखनऊ से एम.बी.बी.एस, एम.एस. उत्तीर्ण हैं। ऐसे नवाबी शहर की नज़ाकत और नफ़ासत जिन पर कोई रंग न जमा पाई हो, वह सूरदास की काली कमली जैसी कोई ढीठ चीज़ ही हो सकती है, यह मानना पड़ेगा।

पहले मैं उनका हुलिया बयान कर दूँ ताकि आप उन्हें जहाँ भी देखें आसानी से पहचान लें। वे अधेड़ उम्र के लंबे  ऊँचे बलिष्ठ शरीर के स्वामी हैं। उस शरीर को मटके से निकला कपड़ा किसी भी तरह पहन लेने का सलीक़ा हासिल है। अगर कमीज़ का आधा हिस्सा भीतर दिखे तो क्या हुआ, आधा तो बाहर है। जब फुरसत होगी वह आधा भी बाहर निकाल लेंगे, क्योंकि सलीके से पूरी कमीज़ भीतर खोंसने में बड़ा कष्ट होता है। बालों की स्टाइल तो पूछिये मत। बाल हों तो स्टाइल भी आए। वे हैं अवश्य लेकिन सदा-सर्वदा इस तरह रँगरूटी अदा से मुस्कुराते हैं कि बढ़िया-से-बढ़िया शैंपू की चमक उनके सामने शरमा जाए। उन्हें देखकर नए-नए रँगरूट कटों का हौसला बढ़ता होगा कि चलो कोई है, जो हममें नहीं पर हम-सा दिखता है। रही बात पाँवों के उपाहन की तो जूतों की क्या मजाल कि उन पर सजें। जूतों के साथ मौजे मेंटेन नहीं करने पड़ेंगे ! सबसे सरल चप्पल है। जब मन चाहा पैरों में डालीं, जब मन चाहा उतारकर एक किनारे रख दीं। कुल मिलाकर उनके रहन-सहन का स्तर ऐसा है कि एक आर.एम.पी. के डॉक्टर को अपने ऊपर गर्व करने का अवसर मिल सकता है। खासकर तब, जब वे इस हुलिये में अपने सदाबहार खटारा (बीस वर्ष पुराने) स्कूटर में शान के साथ सवार रहते हैं।

कहना ज़रूरी है कि उनकी क्लीनिक का हाल उनसे बेहतर है। मरीजों की सुविधा के लिए गद्दीदार बैंचें हैं और आँखें संेकने के लिए विश्व सुंदरियों के चित्र सजे हैं, कहीं-कहीं नटखट नन्हें भी हैं। यों तो क्लीनिक के नाम पर एक बड़ा कमरा है, उसी के एक किनारे पार्टीशन कर डॉक्टर मरीज के साथ अंदर बैठता है। पार्टीशन जाने किस सामग्री से बना ऐसा झिलमिल करता पारदर्शी है कि छायावादी युग में शर्मीली-से-शर्मीली कविता भी न रही होगी। इससे एक आश्वस्ति तो हो ही जाती है कि बाहर बैठे मरीजों को बराबर यह पारदर्शी अहसास होता रहता है कि अंदर क्या चल रहा है ! कोई हसीन मरीज़ा चाहे भी तो डॉक्टर पर डोरे नहीं डाल सकती। हँसिए मत। उनका हुलिया देखकर कोई हसीना उन पर डोरे डालना चाहे, ऐसा नहीं है। उन्होंने अपना हुलिया चाहे जैसा बना रखा हो पर उन्हें बनाते समय विधाता ने ऐसी बेरहमी से काम नहीं लिया था। यही वजह है कि पचास की उम्र में भी वे आकर्षक दिखते हैं। चेहरे और हाथों की मांसपेशियाँ वैसी ही कसी-कसी दिखती हैं, जैसी बीस साल पहले रही होंगी। इससे एक नहीं अनेक ख़ूबसूरत नव या गत-यौवनाओं के दिल में कुछ-कुछ होने की पूरी गुंजाइश रहती है पर वह जो पार्टीशन बीच में सजा है, दसे देखकर दिल धड़कने से भी डरता होगा, ऐसा मेरा विश्वास है। हाँ, अगर आवाजें दीवारों के भीतर क़ैद रहतीं तो दो-चार प्रेमालापों से ही दिल बहलाया जाता, लेकिन यहाँ तो आवाजें झिलमिल करती दीवारों से टकराने के बाद और ज़्यादा खनकदार बनकर बाहर आती है। परिणाम यह होता है कि बाहर बैठे मरीजों को सारी वार्ताओं का एक-एक स्वर स्पष्ट सुनाई देता है और वे बेटिकट अपना स्वस्थ मनोरंजन करने में सफल रहते हैं। चूँकि यह मनोरंजन डॉक्टर की ओर से होता है, इसीलिए सर्वसम्मति से यह उनका स्वाभाविक नाम पड़ गया है-डॉक्टर झटका।

आप सोचेंगे कि ऐसे डॉक्टर की क्लीनिक में तो मक्खियाँ भिनकनी चाहिए पर नहीं जी, अभी वह समय नहीं आया है हमारे देश में कि डॉक्टर को भिनकाने के लिए मक्खियाँ बुलानी पडे़ं। अभी तो यह कमी मरीज़ ही पूरी कर देते हैं। फिर यहाँ इस महँगाई के ज़माने में कंसलटेशन फीस भी काफ़ी कम है। जहाँ औरों के रेट सौ के पŸो से एक नया पैसा भी कम नहीं होता, वहाँ इधर मात्र तीस रुपये हैं। स्वभाव से बचतप्रिय हमारे प्यारे देशवासी सोचते होंगे कि औरों को सौ रुपए दें इससे तो यहाँ आकर तीन को दिखा लें और फिर भी (खा-पीकर) दस रुपये बच रहें।

ख़ैर, डॉक्टर और उनकी क्लीनिक के हुलिये की काफ़ी बातें हो चुकीं, अब ज़रा उनके काम करने का तरीक़ा भी देख लिया जाए। किसी मरीज़ को देखते समय उनके डॉयगनास का तरीक़ा भी एकदम अलग है। अगर मरीज का साथी पहले से कराए टैस्ट वगैरह की रिर्पोटें लिए बैठा है तो वे उनकी ओर देखते तक नहीं। साफ़ कहते हैं कि वे सिर्फ़ अपना डायगनॉस करेंगे और वे स्वयं ही मरीज का निरीक्षण कर दवा लिख देते हैं। मरीज का साथी उपेक्षा का शिकार हो कसमसाकर रह जाता है। इस सभ्य-सुसंस्कृत देश में ऐसी असभ्यता का व्यवहार करना क्या प्रशंसा की बात है ! अब ऐसे डॉक्टर को लोग झटका न कहें तो क्या कहें !

मैंने तो यहाँ तक सुना है कि अगर कभी वे किसी मरीज़ से परीक्षण के लिए कहते भी हैं तो जाने किस गली के अनाम से पैथोलॉजिस्ट के पास जाने की सलाह देते हैं। अब अगर मरीज़ को बहुत ढूँढ़कर भी वह गली न मिले (क्योंकि गलियाँ होती ही न मिलने के लिए हैं) और वह मुख्य मार्ग पर शान से स्थित सबसे बड़ी पैथोलॉजी से जाँच कराता है तो रिपोर्ट देखते ही डॉक्टर साहब घोषणा करते हैं कि ‘यह रिपोर्ट झूठी है। यह सच हो ही नहीं सकती।…और जाओ नामी-गिरामी कमीशनख़ोरी के पास। इस ग़लत परीक्षण के आधार पर दवा दी जाएगी और मरीज़ ठीक नहीं होगा तो उसे बेमौत मारने की गालियाँ किसे मिलेंगी !’ हारकर मरीज (या उसका साथी) उस गली वाले का पता पूछता है और कुछ दिन बाद बदले हुए नतीजे लेकर पहुँचता है तो डॉक्टर झटका को गौरवान्वित होने का अवसर मिलेगा ही।

कोई मरीज़ ऐसा भी होता है, जो अन्य किसी (गंभीर) डॉक्टर की सलाह पर सी.टी. स्केनिंग करा लाता है और रिपोर्ट नॉर्मल होने के बावजूद बीमारी अनसुलझी रह जाने पर इधर चला आता है। शायद इस उम्मीद में कि बड़े-बड़ों के बस में नहीं रहा तो इन्हें ही आजमा लिया जाए। वह जैसे ही रिपोर्ट खोलकर मेज़ पर फैलाता है, डॉक्टर झटके से नाराज़ होते हैं और मरीज से उसका हाल जानने से पहले प्रश्न दागते हैं – ‘बहुत पैसे हो गए थे कि इतना महँगा टैस्ट पहले ही करा लिया। मेरे पास आना ही था तो इतनी देर और रुक जाते। क्या बिगड़ जाता ? आपको पता हो न हो उस घामड़ को तो पता होना ही चाहिए कि यह टैस्ट आखि़री होता है। इससे पहल छोटे और सस्ते तीन होते हैं। अगर उनमें कुछ न निकले तब इसे कराना पड़ता है। यह नहीं कि उन तीनों को फलाँगकर सीधे चौथे पर पहुँचे।’ इसके बाद वह मरीज़ के लक्षण पूछकर किसी मर्ज की घोषणा करते हैं और उसका प्रिस-क्रप्शन लिखने के बादि पुनः एक घोषणा करते हैं – ‘सबके सब कमीशनख़ोर हैं, चाहे वे डॉक्टर हों या पैथालोजी वाले। साले लूटते हैं मूर्ख बनाकर मरीजों को।’ आप चकित होकर सोचेंगे, क्या कोई डॉक्टर खुलेआम ऐसी बातें कह सकता है ? मैं कहूँगी – ‘हाँ, डॉक्टर झटका हर बात खुलेआम कह सकता है।’

भारतीय मरीज़ों की आदत होती है कि वे डॉक्टर से और कुछ पूछें न पूछें, परहेज़ के लिए ज़रूर पूछते हैं। मगर हमारे डॉक्टर झटका हर परहेज़ के खि़लाफ हैं बल्कि यों कहिए कि परहेज़ पूछने वालों की खिल्ली उड़ाते हैं। अगर खाने का परहेज़ पूछता है तो डॉक्टर साहब आश्चर्य से पूछते हैं – ‘क्यों, क्या खाने का भी कोई परहेज़ होता है ? आप खाने-लायक चीज़ों के बाबत ही पूछ रहे हैं न ? आपने सुना है – सकल पदारथ हैं जग माहीं, करमहीन नर खावत नाहीं।’

डॉक्टर की यह बात सुनकर आपको हँसी भी आएगी और चौपाई का चौपाया बनते देख सिर धुनने की इच्छा भी होगी पर पर निराश मत होइए, क्योंकि अभी सिर धुनने के लिए बहुत कुछ है। ऐसा नहीं है कि परहेज़ सिर्फ़ खाने का पूछा जाए। कभी-कभी पीने का भी पूछा जाता है। ऐसे में डॉक्टर साहब जवाब नहीं देते बल्कि उसे अकाट्य बनाने के लिए प्रमाण भी पेश कर देते हैं, इस तरह, ‘पीने का कोई परहेज़ होता है ! हर्गिज नहीं। जिस चीज़ के सेवन से शरीर में ऊर्जा आती हो, उसकी प्रतिरोधी क्षमता बढ़ती हो और मानसिक शांति मिलती हो, वह बुरी हो ही नहीं सकती। मैं एक सच्चा अनुभव बताता हूँ। एक बार मैं कहीं बस में जा रहा था। बस एक ढाबे पर रुकी, उसके बराबर एक डॉक्टर की क्लीनिक थी और दोनों की साझी दीवार में लिखा था – ‘पी, पी, दिल लगाकर पी। जब नहीं रहेगा जी तो कौन कहेगा पी !’ अब आप ही बताइए, एक क्लीनिक की दीवार पर ऐसी धाँसू कविता लिखी हो तो मैं क्या कहूँ !’

फिर कोई मरीज़ नहाने के लिए पूछता है तो डॉक्टर फरमाते हैं – ‘कौन कहता है रोज़ नहाने से स्वस्थ रहते हैं। मैं खुद अक्सर नहीं नहाता तो क्या आपको कहीं से बीमार नज़र आ रहा हूँ !’ आप नाक पर रूमाल रखकर सोचेंगे कि इतनी सड़ी गर्मी में भी जो न नहाए और अपने मरीजों को भी इसी की शिक्षा दे ऐसा भी कोई डॉक्टर हो सकता है ! हो सकता है तो सिर्फ डॉक्टर झटका।

यही नहीं, डॉक्टर झटका का प्रिसक्रिप्शन भी सबसे अलग होता है। कम-से-कम दवा, ज़्यादा-से-ज़्यादा देशी इलाज। विज्ञान के इस आधुनिक युग में भी देशी नुस्खे अपनाए जाएँ वह भी एक क्वालीफाइड डॉक्टर के कहने पर तो इसे आप क्या कहेंगे ! आजकल साइनस एक आम बीमारी है, जिसके लिए ये डॉक्टर देशी नुस्खा बताते हैं – ‘रोज़ रात में नमक का पानी नाक के भीतर डालो।’ अगर कोई रेडीमेड ड्रॉप की बात पूछता है तो ये हँसकर कहते हैं- ‘ख़रीद लो डेढ़ सौ रुपये का ड्रॉप। सुंदर कागज़ में लिपटा बाज़ारू ड्रॉप भी वही असर करेगा, जो नमक का पानी। बस अपनी-अपनी समझ की बात है।’

अगर आप बाहर प्रतीक्षारत बैठे हैें तो इस तरह के जीवंत अनुभव आपका विश्वास डगमगा सकते हैं और आप घर लौटने का फ़ैसला भी कर सकते हैं। पर मेरा आपसे अनुरोध है कि जब आप अपना समय ख़र्च कर यहाँ आ ही गए हैं तो तमाशा पूरा देख ही लीजिए यानी डॉक्टर का निकट दर्शन कर ही डालिए। तीन रुपए इतने ज़्यादा भी नहीं।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक डॉक्टर दूसरे डॉक्टर की जमकर तारीफ़ करे या एक पैथी का चिकित्सक दूसरी पैथी को उचित ठहराए। उस पर भी एलोपैथी का चिकित्सक होम्योपैथी, आयुर्वेदिक या किसी और पैथी की प्रशंसा करे तो वह गले के नीचे नहीं उतरती। लेकिन यह डॉक्टर जिस तरह स्वयं उदाहरण जैसी कोई चीज़ है भी नहीं….!

ख़ैर, अब मेरी बारी आने वाली थी। मुझसे एक नंबर पहले वाली मरीज़ा अपने पतिदेव के साथ भीतर गईं। शायद उसके पति ने डॉक्टर से कहा कि मरीज़ा को एक विशेष टॉनिक ही माफ़िक आता है। इस पर डॉक्टर ने साश्यर्य मरीज़ा से पूछा – ‘क्या आप शादी से पहले भी हिंदू ही थीं ?’ एक संकुचित सकारात्मक उŸार पाकर वे बोले, ‘दरअसल, उस टॉनिक में गोमांस होता है। आपको वही माफ़िक आता है तो मैंने सोचा कहीं आप….।’ फिर पति-पत्नी की खिसियाई हुई हँसी सुनकर वे बोले – ‘किसी महिला पर देवी आती थी। उसे यह टॉनिक पिलाया गया तो वह बिफर गई और चिल्लाने लगी, मुझे यह क्या दिया गया है ? मैंने वह टॉनिक छुड़वाने की सलाह दी तब जाकर वह शांत हुई।’

अब तक जो बातें सुनी थीं, उन्हें प्रत्यक्ष देखने और इस आखि़री दृश्य का अनुभव करने से मेरा जो मनोरंजन हुआ, उससे मुझे भयानक अपच हो गई। परिणामतः अपनी बारी आते ही मैंने अपने पति से स्पष्ट कहा कि मैं हर्गिज भीतर नहीं जाऊँगी उस सरफिरे के पास। उन्होंने सलाह दी कि दवा न भी ली जाए पर राय लेने से क्या हर्ज़ है! वह भी सिर्फ़ तीस रुपये में ! मुझे याद आया कि थोड़ी देर पहले मैं भी यह सलाह औरों को दे चुकी हूँ। किंतु सलाह देने और उसे स्वयं अपनाने में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है, अतः मैंने फिर वापस चलने की ज़िद की। मगर जाने किस दुश्मन ने उनके कान इस डॉक्टर के पक्ष में इस तरह भर दिए थे कि वे मुझे भीतर ले जाकर ही माने।

डॉक्टर ने चैकअप करने के बाद मुझे साइनस बताया और उसी देशी दवा के साथ नाममात्र की दवा लिख दी। नहीं, उन्होंने मुझे इतने में ही नहीं छोड़ा। मेरे नाख़ून और आँखें देखकर साफ़ कहा – ‘आपका होमोग्लोबिन बहुत कम है। आप अपने प्रति बहुत लापरवाह हैं और इसमें अपनी तारीफ़ समझती हैं। ख़ून बढ़ाने वाली चीजे़ं लीजिए, सारी थकान, कमज़ोरी अपने आप मिट जाएगी।’ कहना न होगा, पति के लिए यह स्वर्ण अवसर था।

फिर भी उनकी लिखी नाममात्र की दवा से मैं हफ्ते-भर में पूरी तरह स्वस्थ हो गई। आप अचरज से पूछेंगे – ‘क्या सच, डॉक्टर झटका ऐसा कर सकता है !’ मैं कहूँगी- ‘हाँ, तभी तो उसे डॉक्टर झटका कहा जाता है। आम आदमी की पहली पसंद है वह।’

पर अब मुझे उन डॉक्टरों से बहुत सहानुभूति हो रही है, जो अपने और क्लीनिक की मेंटेनन्स में लाखों रुपये ख़र्च करके भी उतने लोकप्रिय नहीं हो पाते, जितने कि डॉक्टर झटका…..!

डॉ0 आशा रावत, देहरादून
एम.ए. (राजनीतिक विज्ञान, हिन्दी), बी.एड | पी.एच.डी.‘हिन्दी निबंधों में सामाजिक चेतना’ पर शोध।

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