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Monday, January 30, 2023
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वन-वे-ट्रैफिक – हिंदी कहानी

हम उस देश के वासी हैं,जो अनेकता में एकता की बेमिसाल मिसाल है। हम भारत वासी एकजुट होकर रहना जानते हैं, इसलिए हमारे ब्लाक में स्थित चार अलग-अलग घरो में ग़ज़ब की एकता तथा तथा सामंजस्य है। इसी एकता के चलते हम चारों पड़ोसी बड़े प्रेम के साथ एक दूसरे का कष्ट बढ़ाने के काम आते हैं और किसी भी विषय और वार्तापर सामने वाले का विरोध कर अपना परम धर्म निभाते हैं।

हमारे पारस्परिक प्रेम का यह आलम है कि हमारे चारों घरो के रसोंईघरों में एक ही कामवाली काम करने आती है- रामकली।बड़ा जीवट और धीरज   है इस रामकली में। तभी तो चारों घरों के खन-खन करते बर्तनों और झर-झर बहते वचनों का अकेले मोर्चा सँभालने में सक्षम रहती हैं वह। एक घर में चार वर्तन हों तों उनका खनकना कानों को गुंजायमान बनाये रखता हैं, फिर एक दूसरे से लगे चार घरों के बर्तनों की खनखनाहट कितनी सुमधुर होगी, यह तो कोई मजा हुआ संगीतज्ञ ही बता सकता है।

हम राम कली के सीमातीत धैर्य को देखकर दुखी रहते थे किंतु एक दिन हमने उसके धीरज का रहस्य जान लिया। दरअसल वह इयर फोन लगाती है यह तो सबको प्रत्यक्ष दिखता है कि इस यंत्र के माध्यम से उसके कान हमारे कानों की तरह सामान्य हैं यानी उन्हें सब वह सुनने को मजबूर होना पड़ता है जो उनके आस-पास भिन-भिन करता गुजरता है। किंतु रामकली इस बेबसी का शिकार नहीं है। वह अपने यंत्र को किसी तकनीकी खराबी के कारण उसका ऐच्छिक प्रयोग करने में समर्थ रहती है। जब सुनने की जरूरत हुई, इयर फोन का तार हिला दिया। जब न हुई पडे़ रहने दिया, अब पता चला, इसीलिए हमसे बातें करते समय उगँली में दुपट्टे के कोने की तार को लपेटती थी। हम भ्रम में होते थे कि संकोचवश ऐसा कर रही है।

वाह…क्या सुविधा है! मारे ईर्ष्या के हमारे कलेजे जल-जलकर कलाबतू हो गये। मन चाही बाते सुननी हो तो यंत्र चला दिया, न सुननी हो तो बुझा दिया। अनचाही बाते सुनने के बाद न तो चेहरा जबरन तटस्थ बनाने की जद्दोजहद करनी पड़ती है न पेट में होने वाली खदबदाहट सहनी पड़ती है। अब समझ में आया उसके मुखमंडल पर हरदम मुस्कान क्यों खिली रहती है। जरूर उसे बर्तनों की टंकार सितार की झनकार-सी महसूस होती होगी। कान तटस्थ हो जायँ तो दूसरो का क्रदंन संगीत का मजा देता है। वरना अपने सामने दुुखडा रोने वाले और कुछ नही तो सांतावना का शब्दधन तो देना ही पड़ता है। कितनी खुशनशीब है रामकली! अपने भाग्य में ऐसा सुख कहाँ! इसलिए तो आए दिन टेंशन (तनाव) और डिप्रेशन (अवसाद) जैसे भंयकर रोग घेरे रहते हैं। हर खाद्य पदार्थ कानों से होकर जिगर में जो पहुँचता है।

किंतु शायद यह इंसान की प्रवृति है कि जो सुख उसे सुलभ होता है उसमें उसका मन नही रूचता। इसीलिए इस कमअक्ल रामकली! को इच्छा-श्रवण का वरदान नहीं सुहाता और वह अक्सर अपने यंत्र भी दुरस्त कराने की इच्छा प्रकट करती है।आखिर यह निर्णायक मूड में आ गईऔरा आते ही बोली-

‘मैडम जी…मेंने अपनी मशीन बनने को दे दी  है। पंद्रह दिन बाद मिलेगी। तब तक मैं कुछ नहीं सुन सकती।,

ऐं…!मैंने गौर किया, सचमुच उसका कान सूना था। मैंने पुछा-‘क्या तुम बिलकुल नहीं सुन सकती? फिर तुम्हारा काम कैसे चलेगा!’

उसने अनभिज्ञता में सिर हिलाया तो मैंने संकेत से समझाया। वह हँसकर बोली-

‘नहीं, मुझे ज़रा भी नहीं सुनाई नहीं दे रहा है। फिलहाल एकदम बहरी हो गई हँू।’   

मैंने सोचा नाटक कर रही होगी। थोड़ा बहुत कैसे नहीं सुनती होगी। मुस्कराकर तीर फेंका-

‘किसी चक्कर में मत फँसना। कहीं कोई ऐसा वैसा प्रस्ताव तुम्हारे सामने रखे और तुम इसी तरह हँसती रहो तो वह समझेगा पट गई…।’

लेकिन वह वकाई हँसती रही। जिस मजे से वह हँस रही थी, उससे नही लगता था कि वह किसी भावी आशंका या चिंता से ग्रस्त है। मुझे आश्चर्य हुआ ऐसे कैसे निश्चित दिख रही है यह! श्रवण-शक्ति शून्य हो जाने के बाद भी कोई भय नहीं। यह तो श्ुातुरमुर्ग से भी गई गुजरी स्थिति है।उसमें शत्रु दिखता है। यहाँ तो स्ंयम ही उसे निमंत्रण देनं वाली बात है। सोचा, इसे कुछ ऊँच-नीच समझाऊँ,किंतु फिर चुप रह गई। जब मेरी बात सुनी ही नहीं जायेगी तो उसके मर्म का मूल्यंाकन कैसे होगा भला!

अगले दिन बराबर वाली पड़ोसन ने रामकली का प्रसंग उठाते हुए व्यंग्य किया-

 ‘आजकल मैडम वन-वे-टेªफिक हो गई है।’

 ‘यानी…’मैंने पूछा।

‘वह दूसरो के कान में अपनी बात तो पहुँचा सकती है पर दूसरे की बात उसके कान में जूँ बनकर भी नहीं रेंग सकती। ठाठ हैं।

‘क्यों, इसमें ठाठ की क्या बात है!’ मन ही मन सहमत होते हुए भी मेरे पड़ोसी धर्म ने मुझे विरोध करने के लिए ललकारा।

‘इससे ज्यादा और ठाठ की क्या बात हो सकती है कि हम जो चाहे कह लें पर बदले में हमे कुछ सुनने के लिए बाध्य न होना पडे़। इतना संपूर्ण प्रजातंत्र भला किसके जीवन में आ सकता है!’

‘हर बात सुनने में बुरी नहीं होती। कोई अच्छी भी हो सकती है।’मेने अपना विरोध जारी रखा।

 ‘जो अच्छी होती है न! उसे वह बिना कहे सुन लेती है। कुछ देने की बात कहो तो चट सुन लेती है।’

वह इसलिए कि दानी के चेहरे पर जो तेज होता है, उसे इंसान मन की आँखों से ग्रहण करता है इसलिए समझ जाती है बेचारी…।’

‘बेचारी…!’मेरी पड़ोसन ने मेरी विद्रोही अस्त्र अपने हाथ में लेते हुए कहा-‘आप जिसे बेचारी कह कर सिर चढ़ाती हैं वह वास्तव में बहुत चतुर है। निश्चल चेहरों के पीछे अक्सर बड़े-बड़े छल छिपे होते हैं।’

अपनी पराजय सामने देख मैंने मौन का सदाबहार हथियार उठाना बेहतर समझा।

किंतु मेरा हथियार जल्दीही खुंड़ा सिद्ध हुआ, जबकि मेरी यही प्रिय पड़ोसन इस अदा से राममकली की

शिकायत लेकर मेरे पास आ धमकी गोया मेरे बच्चे ने उसके घर कोई शरारत की हो। वह फड़कते हुए बोली

‘देखी अपनी बेचारी की हरकत…! कई दिनों से खाली बोतलें माँग रही थी। मैंने रेक पर रखी दो बोतलों की और संकेत कर कहा कि जाते समय उन्हें ले जाए और उसके जाने के बाद देखा कि तीसरी भरी बोतल भी गायब।’

‘क्या? भरी…? किस चीज़ की …!’मैंने हैरानी से पुछा ।

‘टॉमेटो सॉस की।’

‘टॉमेटो सॉस…!वह उठा कर ले गई! बिना पूछे…!मैं आश्चर्य में विरोध करना भूल गई थी अतः फिर पूछा,‘बोतल पूरी-भरी थी?’

‘न सही पूरी आधी तो थी न!’

‘ओह…। इसलिए वह समझी होगी कि आप उसे दे रही हैं।’ मैंने इत्मीनान की सॉस ली।

‘यह आप क्या कह रही हैं? इस तरह तो बहुत मुश्किल होगा।’   

वह कुछ और कहतीं कि तत्काल उनका बुलावा आ गया। उनके जाने के बाद मुझे याद आया कि मैंने उन्हें चाय के लिए तो पूछा ही नहीं। गर्म चाय के प्याले में गर्म से गर्म समस्या का हल छुपा है। फिर यह तो सुनने की ग़लतफहमी से उपजी छोटी-सी समस्या थी। इसके पीछे मैं अपने पड़ोसियों से संबंध बिगाड़ थोड़े ही लूंगी, यह सोचकर मैंने रामकली को आते ही हड़काया।

मेरी मुख-मुद्राओं की अनदेखी कर मुस्कराते हुए उसने कहा, ‘मैडम जी… आप जाने क्या कह रही हैं, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।’

फिर मैंने बोतलें लाकर पड़ोसी घर की ओर इशारा करते हुए संकेतों से पूछा, ‘उन्होंने तुम्हें दो बोतलें दी थीं। तुम तीसरी क्यों ले गईं ?’

इस पर सह सब कुछ समझने की अदा से बोली, ‘उन्होंने तीन बोतलें एक रैक पर रखी थीं और तीनों का वजन एक बराबर था। घर जाकर देखा तो तीसरी में चुटकी-भर सॉस था। वह भी बेस्वाद।’

मुझे लगा, मेरी पड़ोसन ठीक थी। यह जो सरलता की मूरत बनी खड़ी है, हक़ीक़त में महान कलाकार है। आगे उसने जो कहा, वह मुझे हैरान करने के लिए क़ाफी था। उसने कहा-

‘जाने कैसा गोबर-सा सॉस था वह। उससे तो मैं चटनी अच्छी बना लेती हूं।’

वह तो तुम बना ही रही हो हम सबकी। मैंने कहना चाहा पर नहीं कहा।

कुछ दिन हमारे ब्लाक में यह प्रकरण चर्चा का विषय बना रहा। धीरे-धीरे भुला दिया जाता कि दूसरी घटना घट गई। ऊपरवाली पड़ोसन ने बताया कि रामकली ने बच्चों के लिए रखा खाना खा लिया। मैंने डांटा तो बोली आप ही ने तो कहा था, ‘खा लो। सो खा लिया। अब बच्चों का क्या! उन्हें ब्रेड खिला दो।’

‘भई, मैं तो इसे नहीं रखने वाली। यह महीना ख़त्म होते ही हिसाब कर दूंगी।’

उसके इस प्रस्ताव का बराबर वाली पड़ोसन ने तत्काल अनुमोदन कर दिया। बची तीसरी पड़ोसन और मैं। हम दोनों ने अपनी राय गुप्त रखी।

फिर तीसरी पड़ोसन के साथ भी कुछ ऐसा घटा कि वह उधर की पाली में बैठ गई। हुआ यों कि रामकली उसके बरामदे में रखी साड़ी उठा ले गई और स्पष्टीकरण में स्पष्ट करने लगी कि कई दिनों की वादाखिलाफी के बाद उसने यह क़दम उठाया है।

इस तरह की छिटपुट वारदातें बढ़ने लगीं और उन्होंने मुझे भी अपने लपेटे में ले लिया। फिर ऐसी घटना घटी, जिसने सबके निर्णय को निर्णायक मोड़ दे दिया। वह दो जून की छुट्टी मांगकर गई और दो दिन बाद लौटी। चलो, कोई मजबूरी होती तो अलग बात थी लेकिन उसने आते ही सबसे अलग-अलग कहा कि वह दो दिन की छुट्टी पर गई थी दो जून की नहीं।

उसके इस झूठ ने सबको स्तब्ध कर दिया। एक चौकोर मेज़ सम्मेलन में यह तय पाया गया कि रामकली पहले ऐसी नहीं थी। जब कान में यंत्र लगाती थी तो दूसरों की आधी-अधूरी बातें सुन-समझकर उनका सार ग्रहण कर लेती थी और वही करती थी जो अपेक्षित होता था किन्तु अब वह प्रत्येक बात का विपरीत अर्थ (सिर्फ़ अपने हित में) लगाने लगी है।

ऐसा क्यों हुआ, मालूम नहीं। पर जब हो ही गया तो एकमात्र विकल्प यही बचता है कि वर्तमान महीना समाप्त होने का इंतज़ार किया जाए और इंतज़ार पूरा होते ही इस बला से मुक्ति पाई जाए।

आखि़र प्रतीक्षा की घड़ियां अंत की ओर आ गईं। बस, आने वाली सुबह हमें अपना सम्मिलित फ़ैसला कार्यान्वित करना था। फै़सले की पूर्व संध्या पर हम चारों लॉन में बैठी भावी मुक्ति पर प्रसन्नता मना रही थीं कि अचानक हमारे सामने रामकली प्रकट हुई। वह काम करने किसी के घर के भीतर जाने की अपेक्षा हम लोगों के सामने खड़ी हो गई।

‘क्या बात है रामकली! आज बड़ी ख़ुश दिखाई दे रही हो।’

किसी ने पूछा तो उसने कहा, ‘मुझे आप लोगों से कुछ कहना है।’

‘कहना तो हमें भी है पर पहले तुम कहो।’ बराबर वाली पड़ोसन ने कहा।

‘मैं कल से काम पर नहीं आऊंगी।’

‘क्या!’ हम सब एक साथ चौंके। ‘क्यों ?’ हमने एक साथ पूछा, ‘कहीं जा रही हो ?’

‘हां जी…! समझ लीजिए देश की सेवा करने जा रही हूं। मैं अपने गांव की परधान बन गई हूं। ये देखिए इसीलिए कानों में यह नई मशीन लगा ली है।’ उसने बड़े सलीक़े से कहा।

‘अब तुम्हें इसकी क्या ज़रूरत…!’ किसी ने कहा।

‘तो ये पन्द्रह दिन तुम्हारे प्रशिक्षण के थे, जिनमें तुम कामयाब रहीं। है न!’

किसी ने पूछा तो वह जवाब में मंद-मंद मुस्कुराती रही और फिर विदा लेकर चली गई। चित्रलिखित-से हम लोग सोचते रह गए, क्या मुक्ति इस तरह मिलनी थी!

डॉ0 आशा रावत, देहरादून
एम.ए. (राजनीतिक विज्ञान, हिन्दी), बी.एड | पी.एच.डी.‘हिन्दी निबंधों में सामाजिक चेतना’ पर शोध।

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  1. आपकी रचनाओं को हमने शैलवानी ही नहीं शुभ तारिका पत्रिका अम्बाला छावनी के माध्यम से भी पढ़ने का अवसर मिलता रहता है। कहानी लेखन महाविद्यालय के निदेशिका उर्मि कृष्ण जी से बहुत पुराना परिचय रहा है। उनके कई शिविरों में मैं सम्मिलित रहा हूँ।
    परंतु शैलवानी के माध्यम से ही पहली बार अपनी प्रतिक्रिया देने का सहज सुलभ अवसर मिला है।

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