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Monday, January 30, 2023
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मुख्य धारा के साथ – कहानी

दोस्तो, आज मैं आपको एक ऐसे युवक की सच्ची कहानी सुना रही हूँ, जो एक सरकारी महकमे में नया-नया अफसर बनकर आया है और आते ही सारा सिस्टम एक झटके में सुधार लेना चाहता है। दूसरे शब्दों में उस पेड़ को उखाड़ फेंकने का दम भरता है, जिसकी जड़ें बरसों से नींव के भीतर तक जमी हैं। जड़ें उखड़ेंगी तो नींव को नुकसान पहुँचेगा। ऐसे में अचानक भवन गिरेगा तो खुद कहाँ जाएगा, यह उसकी समझ में नहीं आता। शायद वह समझना ही नहीं चाहता इसीलिए तो एक ही धुन लगा रखी है कि अपने दफ्तर में भ्रष्टाचार नहीं होने देगा। उसका दावा है कि एक मछली सारे तालाब को गंदा कर सकती है तो एक मछली तालाब की सारी गंदगी दूर भी कर सकती है।

अपने उद्देश्य को अंजाम तक पहुँचाने के लिए वह अक्सर अपने मातहतों को बुलाता है और उनके संभ्रान्त चेहरों पर अपने प्रश्न को गोली बनाकर दागता है –

‘आप लोग ऊपरी पैसा क्यों लेते हैं ? क्या इसे लिए बिना आपका गुज़ारा नहीं हो सकता ?’

इतने संवेदनशील मुद्दे को इस तरह बेपर्दा होते देख मातहत अधिकारी भौंचक्के-से रह जाते हैं। कुछ पल सिर झुकाए खड़े रहने के बाद वे स्पष्टीकरण के रूप में दो तरह के तर्क पेश करते हैं –

-सरकार की ओर से मिलने वाला वेतन इतना कम होता है कि इस महँगाई के जमाने में गुज़ारा होना बिलकुल संभव नहीं। इसीलिए लेना पड़ता है।

-आए-दिन आला अफसरों की आवभगत पर होने वाला ख़र्च इतना ज़्यादा होता है कि उसके सामने वेतन की कोई औक़ात नहीं। अपने पास से ख़र्च करेंगे तो खाएँगे क्या ! इसीलिए लेना पड़ता है।

इन दलीलों को सुनकर कौन इनसे सहमत नहीं हो जाएगा ! आखि़र ये सच्ची हैं और हकी़क़त की ज़मीन से जुड़ी हैं। अतः इन मातहत अधिकारियों से सहानुभूति महसूस करना मानवीय है। लेकिन इस युवा अफसर को देखिए, कैसे साँप की तरह फुँफकार रहा है और लीजिए अब तो इसका भाषण बनाम उपदेश भी शुरू हो गया। बानगी देखिए –

‘वेतन में गुज़ारा न हो पाना और चादर के बाहर पाँव पसारना एक ही बात है। क्या ज़रूरत है अपनी इच्छाओं को ऐसे पंख लगाने की कि वे रुकने का नाम न लें। बस उड़ती ही रहें। नौकरी में लगने से पहले पता नहीं किया था कि तनख़्वाह कितनी है या ऊपरी तनख़्वाह का पता लगाते रह गए ! रही बात आला अफसरों के आवभगत की, तो क्या वे यहाँ किसी शुभ-समारोह में आते हैं कि दावत दी जाए ! सरकारी दौरे के लिए यात्रा भŸाा अलग से दिया जाता है न ! वह कब काम आएगा ? किसी पर बोझ बनना क्या अच्छी बात है !’

ज़रूर आप भी मातहतों की भाँति मन-ही-मन माथा ठोक रहे होंगे और सोच रहे होंगे कि इस तरह के आदर्श भरे डायलॉग्स फ़िल्मों में ही शोभा देते हैं, लेकिन फ़िल्म-फ़िल्म है और हक़ीक़त-हक़ीक़त। सभी जानते हैं कि आला अफसर का आतिथ्य-बोझ वास्तव में बोझ नहीं होता। कोई मतिमंद ही होगा जो अपनी किसी हरकत से अतिथि अफसर को नाराज़ करेगा। रूठे यार और रूठे रब को मनाया जा सकता है लेकिन रूठे अफसर को मनाना बिलकुल मुमकिन नहीं। उसका रूठना कोई-न-कोई कहर बरपा कर ही मानता है। किंतु अपने इस युवा अफसर के भेजे में इतनी-सी बात समा नहीं रही। समाए कैसे ! आँखों में वे रंगीन सपने जो तैर रहे हैं, जो सिर्फ नींद में अच्छे लगते हैं। भगवान जाने, यह तंद्रा कब टूटेगी। इन दिनों दफ्तर में यह मुद्दा चर्चा और चिंता दोनों का विषय बना हुआ है। अजीब माहौल हो गया है दफ्तर का। नियंत्रण में दिखता, किंतु तनाव से भरा हुआ। ऐसे में कुछ और हो न हो पर काम तो नहीं हो सकता न !

इधर जनाब इकतरफ़ा सफ़ाई-अभियान में व्यस्त हैं। अकेले ही। इस अभियान के चलते भूतपूर्व फ़ाइलों का बारीकी से अवलोकन किया जाता है। जो आँकड़ा ज़रा भी गड़बड़ दिखा, उसे लाल स्याही के दायरे में खींच दिया जाता है। उनकी नज़र में लाल रंग क़ानून का प्रतीक है अर्थात् नियम का उल्लंघन करना ख़तरे से खाली नहीं है।

फ़ाइलों का निरीक्षण हो चुका, अब मातहतों के परीक्षण की बारी है। बेचारे मातहत ! ज़रा सोचिए, उनकी जगह आप होते तो कैसी दुर्गति झेल रहे होते ! ये तो झेल ही रहे हैं। जी-भर लानत मलामत खा चुकने के बाद वे अपने अफसर को विनम्र सुझाव देते हैं कि क़ानून को बीच में लाना किसी के हित में नहीं होगा। इतिहास गवाह है- लाल स्याही के भीतर जो गड़बड़ घोटालों की लाज ढकी है। यही वजह है कि शीर्ष पर बैठे हुए सज्जन इन कमियों पर ध्यान नहीं देते यानी छोटे-मोटे अपराधों को हँसकर क्षमा कर देते हैं।

अफसर इन गड़बड़ियों की तह में जाना चाहता है तो उसे बताया जाता है कि विभिन्न अवसरों पर होने वाली दावतों, अतिथियों के लिए पाँच-तारा होटलों और टैक्सियों का इंतज़ाम करने वाले वहीं हैं, जो लाल स्याही के भीतर रखे गए हैं।

यह सुनकर अफसर का आपा, आपे से बाहर हो जाता है और वह स्पष्ट घोषणा करता है कि अब तक जो हुआ सो हुआ, लेकिन आज से इस दफ्तर में किसी की आवभगत पर कोई ख़र्च नहीं किया जाएगा। टैक्सी के बदले सरकारी बस और पाँच-तारा होटल की जगह सरकारी अतिथि-गृह से काम चलाया जाएगा। आख़िर महकमा भी तो सरकारी है न!

अब आप ही बताइए, जिसमें घास-पात और मुर्ग़-मुसल्लम में फ़र्क करने की तमीज़ न हो, जो बस में सफ़र करना और टैक्सी में सफ़र करना समान समझता हो, उसे देखकर मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक नहीं है क्या कि वह इतना बड़ा अफसर बन कैसे गया ! दरअसल, यह सब ‘कागद लेखी’ का कमाल है, इसीलिए दिमाग़ के बदले दिल से काम लिया जा रहा है। जिस दिन ‘आँखन देखी’ का अर्थ समझ में आएगा, उसी दिन उसे अहसास होगा कि दिल और दिमाग़ के घोड़े अगर अलग-अलग दिशाओं में दौड़ते होें तो दिल के घोड़े की लगाम खींचकर (रोककर) दिमाग़ के घोड़े को दौड़ने देना चाहिए।

वह दिन जब आएगा तब आएगा तब तक इस दफ्तर का क्या हो ! होनहार मातहत अधिकारी क्या करें ? इस अफसर के प्रौढ़ होने का इंतजार करें और हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें ! इस तरह तो हो चुका। सारा विकास-कार्य एक झटके में ठप हो जाएगा। देशहित में जल्दी कोई-न-कोई उपाय ढँूढ़ना ही पड़ेगा।

कहते हैं कि हर समस्या अपने साथ समाधान लेकर पैदा होती है। अगर धैर्यपूर्वक चिंतन-मनन किया जाए तो कठिन से-कठिन समस्या के उपाय सूझ जाते हैं। यहाँ इन मातहत अफसरों को भी दो उपाय सूझे हैं –

एक, इस दफ्तर में कभी-न-कभी कोई-न-कोई आला अफसर आएगा ही। जब वह आए तो उसका स्वागत-सत्कार बॉस की घोषणा के अनुसार ही किया जाए। हालाँकि ऐसा करना अमानवीय होगा किंतु क्या करें ! मजबूरी है। अवसर मिलने पर सारी मजबूरियाँ कारण-सहित जता दी जाएँगी। यानी दुर्घटना घटने दी जाए।

दो, ऊपर वाले के पास फ़रियाद लेकर पहुँचा जाए कि इस अफसर को अपने पास बुला लो। यह बात अलग है कि ऐसे लोगों को सबसे ऊपर वाला भी अपने पास नहीं रखना चाहेगा। फिर भी इसे बुला लो। नहीं बुलाते तो अन्यत्र भेज दो, पर यहाँ न रखो। यानी दुर्घटना घटने की प्रतीक्षा न की जाए। उससे पहले ही निदान की व्यवस्था कर ली जाए।

और इस बीच बॉस को मुख्यधारा में लाने के लिए तरह-तरह से मनाने-समझाने के प्रयास चलाए जाएँ। क्या पता, उन्हें सद्बुद्धि आ ही जाए।

दोस्तो, आपका क्या अनुमान है ! इस कहानी का अंत क्या होगा। वह युवक अफसर अपना अलग राग छोड़कर मुख्यधारा में बहना शुरू करेगा या नहीं ! उसे बहना चाहिए या तैरना चाहिए……!    

डॉ0 आशा रावत, देहरादून
एम.ए. (राजनीतिक विज्ञान, हिन्दी), बी.एड | पी.एच.डी.‘हिन्दी निबंधों में सामाजिक चेतना’ पर शोध।

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