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Wednesday, May 25, 2022
उत्तराखंड दर्पण श्रद्धा के द्वार बदरीनाथ व केदारनाथ

श्रद्धा के द्वार बदरीनाथ व केदारनाथ

नगाधिराज हिमालय की गोद में बसा गढ़वाल उत्तराखण्ड आदिकाल से ही ऋषि-मुनियों एवं संत महात्माओं की तपस्थली रही है। कालान्तर में इन तपस्थलियों ने अनेक महत्वपूर्ण तीर्थों एवं देवस्थलों का स्वरूप धारण कर लिया, जिनमें बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मध्यमहेश्वर, त्रियुगीनारायण, हेमकुण्ड (लोकपाल) आदि विशेष वन्दनीय हैं। गढ़वाल हिमालय का लगभग 20 लाख आबादी वाला यह पावन भू-भाग सुविख्यात मठ-मंदिरों के लिए ही नहीं अपितु सर्वश्रेष्ठ दर्शनीय सौंदर्य स्थलों के लिये भी प्रसिद्ध है। अतः यह पर्वतीय अंचल ‘‘देवभूमि उत्तराखण्ड’’ के नाम से प्रसिद्ध है।

पुराणों में कथन है कि मानव बदरीनाथ धाम की यात्रा कर लेता है तो उसे भवसागर में नहीं भटकना पड़ता है।

श्री बदर्याश्रम पुण्यं यत्र-तत्र स्थितः स्मरेत।

सयाति वैष्णवं स्थानं पुनरावृतिवर्जितः।।

(बदरी धाम का स्मरण यदि मानव किसी स्थान से कर ले तो मरणोपरांत उस स्मरण मात्र से ही जीव को पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता।)

बदरीनाथ मंदिर देश की प्राचीन सांस्कृतिक एवं भावात्मक एकता तथा अटूट श्रद्धा-आस्था-सम्मान का महत्वपूर्ण प्रतीक है। दक्षिण भारत से सुदूर उत्तराखण्ड में स्वामी शंकराचार्य ने भगवान बदरीनाथ की मूर्ति प्रतिष्ठापित की और आज भी दक्षिण भारत में केरल राज्य के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण मुख्य पुजारी रावल ही बदरीनाथ मंदिर के पूजा-श्रृंगार के अधिकारी हैं। इस मंदिर में सनातन धर्मी, बौद्ध, जैन आदि धर्मावलम्बी बड़े श्रद्धा-सम्मान की दृष्टि से आते हैं व पूजा करते हैं। प्राचीनकाल से ऋषि-महर्षियों से लेकर आज तक के संतों, ज्ञानियों एवं मनीषियों ने यहीं तपस्या की थी। महाभारत के कथनानुसार भगवान श्रीकृष्ण मनु के स्थान पर गये और पाण्डव वनवास के समय बदरिकाश्रम में कुछ समय तक निवास करते रहे। पुराणों में श्रेष्ठ तपोभूमि बदरिकाश्रम तथा चारों हिमानी धामों में श्रेष्ठ धाम बदरीनाथ कहा गया है। इस पुण्यभूमि के संबंध में कहा गया है:-

बहुनि संति तीर्थानि, दिविभूमि रसासु च।

बद्री सदृश्यं तीर्थं, न भूतो न भविष्यति।।

बदरीनाथ भगवान से संबंधित आये दिन अनेक भजन, गीत व स्तुतियां प्रचलित हैं लेकिन भारत के इस सुप्रसिद्ध हिमानी तीर्थ श्री बदरीनाथ धाम की निम्न अंकित स्तुति में भारत के लाखों श्रद्धालु भक्तों के कंठ से मुखरित स्वर-लहरी लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व नजीर अहमद नामक एक मुस्लिम भक्त ने लिखी थी-

पवनमंद सुगंध शीतल, हेममंदिर शोभितम्।

निकट गंगा बहत निर्मल, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।

शेष सुमिरन करत निशिदिन, ध्यान धरत महेश्वरम्।

श्री वेद ब्रह्मा करत स्तुति, श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम्।।

बाद में यह जानकारी उत्तर प्रदेश के पेस्तर के सेवानिवृत्त डिप्टी पोस्ट मास्टर जनरल नरोत्तम डोभाल ने ‘‘हिन्दुस्तान’’ प्रतिनिधि को नन्दप्रयाग में दी कि उक्त नजीर अहमद बदरीनाथ डाकघर में सबसे पहले सब पोस्ट मास्टर रहे थे। स्मरण रहे हिन्दी प्रेमी संत नजीर अहमद की स्वरचित रचना (स्तुति) को आज भी श्रद्धातु भक्त बदरीविशाल की स्तुति के समय गाते हुये आनन्द का अनुभव करते हैं। अब यह सुन्दर रचना छोटी पुस्तिका के रूप में बदरीनाथ में तथा अन्य धार्मिक स्थलों में उपलब्ध रहती हैं।

पौराणिक मतानुसार गढ़वाल ‘‘केदारखण्ड’’ के नाम से भी विख्यात है। चूंकि केदारखण्ड द्वादश ज्योर्तिलिंगों में एक लिंग है और इस देश का अधिपति माना जाता है, अतः इस भूभाग का नाम ‘‘केदारखण्ड’’ पड़ा। इसके अंतर्गत सैकड़ों तीर्थ हैं। उत्तुंग शिखरों की गोद में एवं सुरम्य मंदाकिनी के पावन तट पर विराजमान केदारनाथ मंदिर (11,750 फीट) तक पहुंचने के लिये गौरीकुंड से 14 किमी0 का दुर्गम एवं चढ़ाई युक्त कष्ट-साध्य पैदल मार्ग तय करना पड़ता है। लेकिन श्रद्धालु यात्रियों को उत्तराखण्ड के इन विकट हिमानी धामों के दर्शन का कटु अनुभव एवं आकर्षण इसी केदारनाथ की यात्रा में मालूम पड़ता हैं केदारनाथ मंदिर के प्रांगण में बने चबूतरे में बैठकर हिमशिखरों का आकर्षण एवं मनोहारी दृश्य देखकर पर्यटक यात्री कुछ देर तक अपने आपको खो बैठता है। मंदिर के पीछे 20-22 हजार फीट ऊंचे उन्नत हिम शिखरों से मंदाकिनी, मधुगंगा, सरस्वती गंगा, क्षीर गंगा एवं स्वर्गारोहिणी जल प्रवाह निकलते हैं। मंदिर के पीछे आदिगुरु स्वामी शंकराचार्य की समाधि है। मंदिर के पास ही उदककुंड, हंसकुंड, रेतकुंड एवं कुछ दूरी पर वासुकीताल स्थित है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अस्थि विसर्जन के बाद यह ‘‘गांधी सरोवर’’ के नाम से सुपरिचित हो गया है।

स्कंदपुराण के कथनानुसार द्वापर में जब हिमालय में पाण्डव शिवजी के दर्शन करने जाने लगे तो शिवजी उन्हें ‘‘गोत्र हत्या’’ का दोषी मानकर दर्शन नहीं देना चाहते थे। अतः क्रोधवश उन्होंने स्वयं महिष रूपी शिलाधारण कर पृथ्वी में प्रवेश करना चाहा। जैसे ही उनका अग्रभाग भूमि के अन्दर घुसने लगा कि तुरन्त महाबली भीम ने उन्हें पकड़ लिया। इस पर शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिये और उन्हें गोत्र-हत्या के श्राप से मुक्त कर दिया। इसी भांति उनका अग्र भाग नेपाल में विख्यात पशुपतिनाथ के नाम से प्रकट हुआ। शेष पीछे धड़ का भाग केदारनाथ में, बांहें तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मध्यमहेश्वर में तथा जटा का भाग कल्पेश्वर में पूजे जाते हैं जो ‘‘पंचकेदार’’ के नाम से प्रसिद्ध तीर्थ हैं। इसी भांति बदरीनाथ धाम में विशाल बदरी के अलावा वृद्ध बदरी, योगध्यान बदरी, भविष्य बदरी तथा आदि बदरी तीर्थ स्थल हैं जो ‘‘पंच बदरी’’ के नाम से प्रसिद्ध हैं।

प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर हिमालय की पावनता के ये पौराणिक पुण्य हिमानी धाम भावात्मक एकता के प्रेरणा-स्रोत हैं और साथ ही भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के उद्गम-स्थल भी हैं। देश के कोने कोने से प्रतिवर्ष ग्रीष्मकाल में हजारों-लाखों श्रद्धालु यात्री बदरीनाथ, केदारनाथ आदि सुविख्यात तीर्थों की परिक्रमा कर दैविक, दैहिक एवं भौतिक पापों से मुक्त होकर परमशांति एवं आत्मीयता का अनुभव कर कृत्य-कृत्य हो जाते हैं।

श्री राधाकृष्ण वैष्णव
श्री राधाकृष्ण वैष्णव, नन्दप्रयाग | स्वतंत्रता संग्राम पत्रकार | सात दशकीय पत्रकारिता/साहित्य लेखन

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