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Wednesday, May 25, 2022
उत्तराखंड दर्पण उत्तराखण्ड में प्रस्फुटित अध्यात्म विज्ञान एवं साधना के विविध रूप

उत्तराखण्ड में प्रस्फुटित अध्यात्म विज्ञान एवं साधना के विविध रूप

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छांह।
एक पुरुष भीगे नयनों से,देख रहा था प्रलय प्रवाह।। (कामायनी)

उपर्युक्त काव्य धारा के कल्पनाजनित विश्वास के संदर्भ में यदि भूगर्भ-शास्त्रियों द्वारा किये गये वर्तमान अनुसंधान एवं अति प्राचीन पौराणिक आख्यानों का गहन अध्ययन किया जाय तो स्पष्ट हो जायेगा कि महाप्रलय के बाद नूतन सृष्टि के प्रारंभ में पर्वतराज हिमालय ने सर्वप्रथम औषधीय एवं खाद्य पदार्थों के रूप में जड़ी-बूटियों को ही जन्म दिया था। वेद ऋचाओं के रूप में, ‘‘या औषधीः पूर्वाः जाता’’ का उल्लेख इस कथन की पुष्टि करता है और इसी के बाद पितातुल्य हिमगिरि ने धरती माता की पावन गोद में प्रथम मानव-मानवी को सृष्टि के नव निर्माण एवं विकास हेतु अवतरित किया। मानव जाति ने सर्वप्रथम इसी पर्वत श्रृंखला के रहस्यमय गह्वरों में प्रकृति प्रदत्त वनस्थलियों के पावन अचंल में भौतिक एवं आत्म विकास की प्रथम रूपरेखा का निर्माण किया और कालान्तर में देवत्व की गरिमा से विभूषित ऋषियों की ज्ञानचक्षु के साये में वेद ऋचाओं के रूप में मानव ने अध्यात्म-विज्ञान के सुघरतम रूप का अवलोकन किया। इसीलिये हिमालय को ‘देवात्मा’ के रूप में कई संदर्भों में देखा गया है।

भारत के अतिरिक्त भी विश्व के अनेक भागों में बर्फीली चट्टानों से आच्छादित उच्च पर्वत श्रृंखलायें प्राचीन काल में थीं और आज भी वे मानव-रहित प्रखण्डों के रूप में पूर्ववत् अवस्थित हैं किन्तु हिमालय के हृदयस्थल में जिस वैज्ञानिक प्रकाश एवं आध्यात्मिक ज्योतिपुंज की शीतल छाया की अनुभूति होती है वह अन्यत्र किसी पर्वत श्रृंखला पर दृष्टिगोचर नहीं होती। इस धरती पर आध्यात्मिक ऊर्जा तथा वैज्ञानिक चमत्कार का जो रूप देखने को मिलता हे उसकी कल्पना भी पृथ्वी के अन्य किसी भी छोर पर नहीं की जा सकती। इस प्रखण्ड में ऋषियों-महर्षियों द्वारा सृजित आत्मज्ञान की जिस अलौकिक किरण के संचार की सुखद अनुभूति होती है उसका दर्शन पृथ्वी के अन्य किसी भी भाग में दुर्लभ ही कहा जायेगा। महर्षि व्यास ने इसी सत्य का गुणगान वेद ऋचाओं के माध्यम से कई संदर्भों में किया है। श्रीमद्भागवत में भी वर्णित अनेक प्रकरण इसके स्पष्ट प्रमाण हैं। इस पौराणिक काव्य में कई संदर्भों के माध्यम से इस सत्य का स्पष्ट उद्घोष किया गया है कि देवतुल्य महान ऋषियों की उपस्थिति उनकी सूक्ष्म काया में आज भी ज्ञान चक्षु के माध्यम से देखी जा सकती है।

ज्ञान-विज्ञान विषयक लोक कल्याणकारी अनुसंधान से उन्नत हिमगिरि का यह क्षेत्र आज कई बिन्दुओं पर एक वृहद शोध की अपेक्षा करता है, इसलिये कि रसायन विद्या, आयुर्वेद, खगोल शास्त्र, योग विाान आदि सभी विद्याओं की उत्पत्ति एवं विकास पृथ्वी के इसी खण्ड में सर्वप्रथम सम्भव हो सकी है।

गंगा अवतरण एवं पृथ्वी पर स्वर्ग की परिकल्पना

हिमालय के हृदय स्थल में उत्तरांचल रूप में स्थित यह भू-भाग गंगा अवतरण की कथा से भी सम्बद्ध है। जिसका तात्विक विवरण ‘‘भागीरथी’’ के नाम से हर हिन्दू धर्म ग्रन्थ में बहुलता से मिलता है। पौराणिक आख्यानों में गंगाजी राजा भगीरथ की तपस्या के परिणामस्वरूप स्वर्ग से प्रस्थान करके भगवान शंकर की जटाओं का स्पर्श करती हुई जन कल्याण हेतु पृथ्वी पर अवतरित हुई। यद्यपि राजा भगीरथ की यह तपस्या पौराणिक आख्यानों के अनुसार अपने में एक धार्मिक कथानक का रूप संजोये हुए हैं, किन्तु वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में भगीरथ की इस तपस्या अथवा साधना का भावार्थ कुछ और ही है। वास्तव में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस तप अथवा साधना का अर्थ विभिन्न कार्यों के साथ विभिन्न रूपों में अलग-अलग परिस्थितियों में परिभाषित करना ही उचित होगा।

आत्मज्ञानी सन्त द्वारा किये गये तप की परिणति एक आध्यात्मिक सुखद आनन्द के रूप में होती है तो एक छात्र द्वारा किये गये कठोर श्रम का प्रतिफल उसकी परीक्षा के परिणाम के रूप में मिलता है। कृषक के द्वारा कृषि कार्य में किये गये परिश्रम को भी इसी भाव के साथ लेना उचित होगा। यही नहीं, एक विचारक, एक अन्वेषी, एक अनुसंधानकर्त्ता, एक उद्योगपति की भांति कतिपय अन्य जीवधारी जो किसी कर्म में संलग्न हैं, सभी अपने ढंग से श्रम (तप) करते हैं। इस श्रम, तप, तपस्या अथवा साधना पर यदि और दूर तक चिन्तन करें तो इसका कार्यक्षेत्र बढ़ता ही जायेगा। शक्ति के प्रवाह की कोई सीमा का आकलन अभी तक सम्भव नहीं हो सका है, जो भी जीवन्त शक्ति इस धरती तथा आकाश के बीच जड़ अथवा चेतन के रूप में स्थित है वह मूल रूप में तप अथवा कठोर श्रम से ही सम्बद्ध है। निश्चित रूप से सूर्य भी एक कल्याणकारी उद्देश्य को लेकर ही तपता है। एक अकिंचन कंकड़ तक तप कर ही कुछ (चूना) बनता है और उसके बाद ही यह किसी के कल्याण का साधन बन पाता है। संक्षेप में तप एवं साधना के रूप अपनी स्थिति के अनुसार अलग-अलग होते हैं किन्तु सबका उद्देश्य-अंतिम उद्देश्य एक ही होता है और वह है जीव कल्याण, तप साधना के इस प्रकरण को यदि गंगा अवतरण के संदर्भ में ही प्रारम्भ करें तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि संबंधित कालखण्ड में गंगा की आवश्यकता जल की समस्या के समाधान हेतु हुई होगी और राजा भगीरथ, जो जनमानस की सेवा के प्रति समर्पित थे, के अथक प्रयास से इसका समाधान गंगा की धारा को कैलाश पर्वत से धरती के मैदानी क्षेत्र में प्रवाहित करके किया गया। इस प्रकरण में तथाकथित ‘‘स्वर्ग’’ एवं भगवान शंकर की जटा को एक प्रतीक के रूप में ही लिया गया है अन्यथा अभी तक किये गये विभिन्न अनुसंधानों के परिणाम स्वरूप पृथ्वी से अलग तथा उससे अछूता ऐसा कोई क्षेत्र नहीं मिला है जिसे स्वर्ग का नाम दिया जा सके। वेदों में उद्घोषित अनेक ऋचायें इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि गंगा, यमुना, सिन्धु, शतलज, सरस्वती, रावी, चिनाव आदि नदियां पृथ्वी को खोदकर तथा इन नदियों को प्रवाहित होने के लिये सम्यक मार्गों के निर्माण के द्वारा ही इन्हें प्रथमतः जल समस्या के समाधान हेतु पृथ्वी के मैदानी क्षेत्र में प्रवाहित किया गया था। हिमालय के हृदय स्थल में भगीरथ की जिस तप साधना का प्रथम सूत्रपात इस रूप में हुआ, निश्चित ही वह एक जनकल्याणकारी दृष्टिकोण ही अपने में समाहित किये हुये है और इसका माध्यम आध्यात्म-विज्ञान एवं तप साधना के ही विविध रूपों में एक विशिष्ट रूप है।

जमदग्नि के पुत्र परशुराम प्राचीन भारतीय संस्कृति के नायक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने यमुनोत्री क्षेत्र में एक महान उद्देश्य को लेकर तपस्या की थी। यह उद्देश्य था अत्याचार एवं भ्रष्ट दानव मानसिकता को नष्ट करके लोक कल्याणकारी समाज की स्थापना, और निश्चित ही वे अपने इस अभियान में पूर्ण रूप से सफल हुये जिसके साक्षी हमारे पौराणिक आख्यान हैं। परशुराम का यह कार्य भी उनके तप एवं साधना का ही एक अलग रूप था।

एक शाश्वत अनुसंधान:- आज भी आधे-अधूरे रूप में उपलब्ध ‘चरक संहिता’ इस कथन की पुष्टि करती है कि महात्मा चरक ने हिमालय की कन्दराओं में निवास करके इसे अपना कार्यक्षेत्र बनाया था तथा यहीं से इस महान ऋषि ने वैद्यक को अपना प्रिय विषय बनाते हुए हिमगिरि की वादियों में उपलब्ध जड़ी-बूटियों की गुण और कार्यों पर एक विलक्षण शोध कार्य किया था जिसका व्यावहारिक उपयोग आज भी स्वास्थ्य क्षेत्र में अति लाभकारी सिद्ध हो रहा है। संजीवनी बूटी नाम की औषधि इस क्रांतिकारी ऋषि की सर्वश्रेष्ठ देन है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार महात्मा चरक में वनौषधियों की मौन भाषा तक समझने की क्षमता थी और प्रत्येक औषधि के गुण-दोष वे उन्हीं से जान लेते थे और इसी के आधार पर वे विभिन्न रोगों के अनुसार शोध कार्य करते हुए औषधियों का निर्माण भी इसी के प्रतिफल के रूप में करते थे। अध्यात्म विज्ञान एवं तप साधना का यह एक और रूप है।

नर-नारायण पर्वत श्रृंखला की मौन प्रेरणा:- महर्षि व्यास प्राचीन भारतीय संस्कृति, इतिहास एवं आध्यात्मिक ऊर्जा के प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में समनित हैं। उन्होंने नर-नारायण पर्वत के पावन अंचल को अपनी साधना स्थली बनाया था और विश्व साहित्य के प्रथम अमूल्य ग्रन्थ वेद की रचना यहीं से संपन्न हुई थी। इसक अतिरिक्त सभी पुराणों का लेखन कार्य भी यहीं से पूर्ण हुआ था। आर्ष साहित्य के अतिरिक्त अनेक विषयों पर साहित्य सृजन का महान कार्य इस महान ऋषि ने इसी पावन भूमि पर संपन्न किया था जो आज भी भारतीय संस्कृति की पावन धरोहर के रूप में सुरक्षित है। वास्तव में ऋषि परंपरा का प्रथम बीजारोपण इसी पर्वतराज के अंचल में हुआ था जहां अनेक ऋषि-मुनि एवं साधकों ने निवास करके अपनी लेखनी से भारतीय धर्म दर्शन को इस धरती पर एक शाश्वत रूप देते हुए अध्यात्म, विज्ञान एवं तप साधना का एक अतिविशिष्ट रूप प्रस्तुत किया।

गायत्री महामंत्री के प्रथम दृष्टा:- महर्षि विश्वामित्र ने सर्वप्रथम आद्य शक्ति माता गायत्री का भावात्मक साक्षात्कार इसी पावन क्षेत्र में रहकर किया था। सप्त सरोवर के सात्विक प्रखण्ड में अनवरत रूप से ध्यान मग्न रहकर माता गायत्री की महान शक्ति एवं उनके मंत्र द्वारा प्राप्त ऊर्जा की पूर्ण अनुभूति के फलस्वरूप इसका सम्यक ज्ञान इस महर्षि ने संबंधित काल खण्ड में जनमानस को कराया था जो आज भी बौद्धिक समाज के लिए अनुपम एवं विशिष्टतम वरदान के रूप में आत्मा-परमात्मा के साक्षात्कार का प्रमुख साधन बना हुआ है।   योग विज्ञान की दुर्लभ शिक्षा

देवप्रयाग में अलकनंदा के तट पर योग विज्ञान का प्रयोग महर्षि पातंजलि ने किया था। इन प्रयोगों के द्वारा उन्होंने यह सिद्ध करने का सफलतम प्रयास किया था कि प्रत्येक मानव की शरीर में अजस्र शक्ति उपलब्ध है। यह शक्ति योग विद्या द्वारा ही जागृति हो सकती है और इस शक्ति के जागृति होने पर मानव एक महामानव की ऊर्जा से पूर्ण होकर अनेक कठिनतम कार्य भी सरलता से कर सकता है तथा इस विद्या के द्वारा अपनी शरीर में एक दुर्लभ नूतनता का संचार करने में वह सक्षम हो सकता है।

यज्ञ विद्या का नूतन अनुसंधान

हिमगिरि के अंचल में ही निवास करके महर्षि याज्ञवल्क्य ने यज्ञ विद्या पर शोध कार्य किया था जो स्वास्थ्यवर्धन के लिये आज भी उपयोगी सिद्ध हो रहा है।

उत्तरकाशी में गुरु आरण्यक का सूत्रपात

महात्मा जमदग्नि को पौराणिक आख्यानों के अनुसार बालक एवं वृद्ध दोनों की शिक्षा के सूत्रधार के रूप में जाना जाता है। उन्होंने उत्तरकाशी में रहकर एक विशाल शिक्षण संस्था का निर्माण किया था जिसमें नैतिक शिक्षा के साथ समाज निर्माण की शिक्षा का उत्तम प्रबंध था। इस गुरुकुल रूपी संस्था में अध्यात्म विज्ञान, तप साधना तथा नैतिक शिक्षा के माध्यम से एक स्वस्थ एवं उन्नत समाज की रचना ही विद्यार्जन का प्रमुख उद्देश्य माना गया था।

वीणावादन द्वारा जनजागरण का अनुपम प्रयोग

देवर्षि नारद को त्रिकालदर्शी कहा गया है, उन्होंने अपनी वीणा से जो लय, जो सुर तथा जो तान झंकृत किया उसमें भक्ति भावना की त्रिवेणी प्रवाहित करके समूचे वातावरण को अभिसिक्त करने की अपार क्षमता थी। देवर्षि नारद का कार्य क्षेत्र पूरा हिमालय था किन्तु गुप्तकाशी ही उसका केन्द्र बिन्दु था। निश्चयतः तप साधना का यह एक अनोखा रूप है।

गुरु वशिष्ट का ऋषि धर्म

देवप्रयाग के सात्विक वातावरण में गुरु वशिष्ट ने राजनीति और धर्म पर एक विशेष अनुंसधान किया था और दोनों को एक दूसरे का पूरक बताते हुए एक विशिष्ट मत के प्रतिपादन द्वारा सामाजिक-राजनैतिक न्याय की आधार शिला तैयार किया था जिसे राजधर्म का नाम दिया गया था।

जब पीपल पफल ही जीवनाधर बना

ऋषिकेश के पावन अंचल में ऋषिवर पिप्पलाद ने पीपल वृक्ष द्वारा दिये गये अपने लधुतम फलों पर ही जीवन निर्वाह करते हुए एक विशेष अनुसंधान किया था जिसके प्रतिफल के रूप में सर्वप्रथम यह निष्कर्ष निकला था कि विभिन्न गुणों से युक्त विभिन्न प्रकार के अन्न के सेवन का मस्तिष्क एवं हृदय दोनों पर उसी के अनुसार स्पष्ट प्रभाव पड़ता है।

सौर मण्डल पर विशेष अनुसंधन

हिमालय की एकान्त उपत्यकाओं में विचरण करे हुए आर्यभट्ट ने सृष्टि निर्माण के बाद सर्वप्रथम सौर मण्डल पर पूर्ण अनुसंधान करते हुए यह सिद्ध किया था कि हमारी पृथ्वी का सौर मण्डल से घनिष्ट संबंध है। इस कार्य में उन्होंने गणित विद्या का प्रथम बार प्रयोग करते हुए ज्योतिष विज्ञान को एक नवीन दिशा प्रदान की थी।

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