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Thursday, September 29, 2022
उत्तराखंड दर्पण कुम्भ महापर्व 2021 हरिद्वार

कुम्भ महापर्व 2021 हरिद्वार

कुंभ महापर्व भारत की समग्र संस्कृति एवं सभ्यता का अनुपम दृश्य है। यह मानव समुदाय का प्रवाह विशेष है। कुंभ का अभिप्राय अमृत कुंभ अथवा पवित्र कलश से है। कुंभ के आदि मध्य एवं अंत में ब्रह्मा विष्णु एवं महेश का वास तथा अंतस्थ जल में सागर सहित चारों वेदों का वास माना जाता है, जो भारत वर्ष के पौराणिक एवं शास्त्रीय परंपरा का पोषक है। भारत वर्ष में चार स्थल विशेष हरिद्वार में गंगा तट पर, प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा जमुना सरस्वती के संगम पर, नासिक में गोदावरी के तट पर और उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर, (पवित्र नदियों के तट पर ही) मनाया जाता है। अध्यात्म की दृष्टि से नदियां जीवन रूपी जल के प्रवाह का प्रतीक है साथ कुंभ ऊर्जा के स्त्रोत के साथ-साथ पाप और पुण्य का प्रतिनिधित्व करता है। गंगाजल को अमृत की संज्ञा प्राप्त है। कुंभ महोत्सव का औपचारिक प्रारम्भ पौष मास की पूर्णिमा (14 जनवरी मकर संक्रांति) से हो गया। इसी दिन मकर सक्रांति को ही प्रथम पर्व स्नान किया गया तथा निरंतर लगभग ढाई माह (27 अप्रैल) तक रहेगा। क्योंकि माघ मास की सक्रांति से भगवान सूर्यनारायण का ताप वृद्धि की ओर अग्रसर हो जाता है।

कुंभ के आयोजन में सूर्य चंद्र गुरु और शनि ग्रह की विशेष भूमिका मानी जाती है। इन्हीं ग्रहों के विशेष अवस्था में कुंभ का आयोजन होता है।

1. जब सूर्य और गुरु कुंभ राशि में स्थित होते हैं तो हरिद्वार में कुंभ पर्व का योग बनता है।  
2. जब माघ मास की अमावस्या को सूर्य और चंद्र दोनों मकर राशि पर और बृहस्पति मेष राशि पर स्थित होते हैं तो प्रयाग में कुंभ का योग बनता है।
3. जब सूर्य और गुरु दोनों ही ग्रह सिंह राशि पर होते हैं तो ऐसी स्थिति में नासिक में कुंभ का संयोग होता है।
4. वहीं उज्जैन में कुंभ का सहयोग तब होता है जब गुरु कुंभ राशि में स्थित होते हैं। वस्तुतः प्रत्येक स्थल पर 12 वर्ष में पूर्ण कुंभ का आयोजन किया जाता है। इस दृष्टि से 2010 में हुए पूर्ण कुंभ के पश्चात 2022 में कुंभ का आयोजन होना चाहिए था किंतु हरिद्वार में 11 वर्ष में ही पूर्ण कुंभ का आयोजन किया जा रहा है इसका प्रमुख कारण है कि सन् 2022 में देव गुरु बृहस्पति कुंभ राशि को अतिक्रमित कर जाएंगे और कुंभ राशि पर नहीं रहेंगे। इसलिए सन् 2021 में यह संयोग होने से पूर्ण कुंभ का आयोजन किया जा रहा है। प्रत्येक 3 वर्षों में उपयुक्त स्थानों पर कालचक्र से कुंभ की आवृत्ति हो जाती है। इस दृष्टि से जैसे हरिद्वार में 2021 में आयोजन है तो अगले 3 वर्ष बाद प्रयाग में, उसके पश्चात पुनः 3 वर्ष के अंतर नासिक और फिर 3 वर्ष के बाद उज्जैन में कुंभ का आयोजन होगा। यद्यपि इस वर्ष महामारी के प्रभाव के कारण संपूर्ण अप्रैल माह में ही विशेष रूप में कुंभ का आयोजन किया जाएगा।

गौरतलब हो कि ऐतिहासिक दृष्टि से भारत के इस सबसे बड़े सांस्कृतिक महोत्सव का प्रारम्भ 640 ईसवी पूर्व से है। पौराणिक मान्यता के अनुसार कश्यप ऋषि जिनसे विविध प्रकार की सृष्टि का विस्तार हुआ उनकी दो पत्नियां ‘विनता’ और ‘कदू्र’ थी। विनता के पुत्र गरुड़ हुए और कदू्र के तक्षक आदि सर्प पुत्र हुए। मनोविनोद में एक दिन विनता और कदू्र भगवान सूर्यनारायण के रथ को वहन करने वाले घोड़ों के रंग के बारे में शर्त लगी कि जिसकी बात सिद्ध हो जाएगी। हारने वाली उसकी दासी मानी जाएगी। यद्यपि सूर्य के घोड़ों का रंग श्वेत था किंतु कदू्र के काले सर्प पुत्र घोड़ों की पूछ पर लिफ्ट गए और घोड़ों का रंग काला प्रतीत हुआ जिसमें कदू्र के छल से विनता हार गई और कदू्र की दासी बनी। विनता के पुत्र गुरुड़ जी के कदू्र के पुत्रों की दासता से खिन्न होकर तक्षक से अपनी दासता से मुक्त होने शर्त पूछी जिस पर तक्षक ने कहा कि यदि तुम स्वर्ग में इंद्र के साम्राज्य से ‘अमृत कुंभ’ (अमृत का कलश) ला करके हमें पिला दोगे तो हम तुम्हें अपनी गुलामी से मुक्त कर देंगे। गुरुड़ जी अत्यंत पराक्रमी थे अतः वे इंद्र की विशिष्ट सुरक्षा को भेदकर अपने पराक्रम से अमृत का कलश स्वर्ग से जीत कर ले आए। ‘स्वर्ग से धरती पर लाते हुए गरुड़ जी ने हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन इन चारों स्थलों पर अमृत कलश सहित विश्राम किया। ऐसी मान्यता है कि इन स्थलों पर जहां-जहां अमृत का कलश रखा गया उन्होंने स्थलों पर एक-एक बूंद अमृत की निःसूत (टपकी) हुई। जिसके कारण अध्यात्म और धर्म के लिये यह स्थान सदा सर्वदा के लिये पवित्र हो गये और इसी के कारण इन स्थलों पर कुंभ में उत्सव का आयोजन किया जाता है। (यद्यपि गरुड़ जी स्वर्ग से अमृत का कलश लाकर अपनी चातुर्य के कारण सर्पों की दासता से सदा के लिये मुक्त हो गये और सर्पों के अमृत पान करने से पहले ही इंद्र उस कलश को पुनः स्वर्ग ले गये और सनातन संस्कृति की अक्षुण्ण परंपरा के निर्वहन के लिये कुंभ के आयोजन के लिये मील का पत्थर स्थापित करके चले गये)। इसी पौराणिक घटना के आधार पर ही इन चारों तीर्थों को अमृत तीर्थ माना जाता है और इसी अमृतत्व के कारण सतयुग से अद्य पर्यंत इस महोत्सव के ब्याज से भारत वर्ष की अध्यात्म परंपरा निरंतर प्रवाह चल रहा है।    

डॉ0 कुलदीप चंद्र पंत, हरिद्वार
साहित्य विभागाध्यक्ष | जय भारत साधु महाविद्यालय, हरिद्वार | पी.एच.डी.: ‘श्रीमद् भागवत महापुराण में प्रतिपादित दार्शनिक सिद्धांत’

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