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Wednesday, May 25, 2022
उत्तराखंड दर्पण सिखों व हिन्दुओं का मानसरोवर है: हेमकुण्ड-लोकपाल

सिखों व हिन्दुओं का मानसरोवर है: हेमकुण्ड-लोकपाल

मध्य हिमालय की गोद में बसा हुआ भूखण्ड गढ़वाल ख्याति प्राप्त दिव्य एवं ऐतिहासिक प्राचीन मठ-मन्दिरों, हिमानी पर्वत शिखरों के मध्य स्थित अनेक रमणीक सरोवरों, जल-प्रपातों तथा आकर्षक गरम जल-धाराओं के लिये ही नहीं अपितु प्राकृतिक सुषमा से भरपूर विश्व विख्यात अद्वितीय मनोरम स्थलों के लिये भी सुप्रसिद्ध है।

इन सुविख्यात स्थलों में ऐतिहासिक गन्दमादन पर्वत पर हिमाच्छादित शिखरों के मध्य स्थित हेमकुण्ड-लोकपाल (1500 फुट) तीर्थ सिखों व हिन्दुओं की तपस्थली है। लोकपाल लक्ष्मण जी की तपस्थली रही है इसलिये यह प्राचीन तीर्थ हिन्दुओं की श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। गुरु गोविन्द सिंह की पूर्वजन्म की तपस्थली होने के कारण हेमकुण्ड तीर्थ सिखों के लिये अत्यन्त श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित एवं विकसित इस हेमकुण्ड गुरुद्वारे में अब प्रतिवर्ष हजारों सिख यात्री दर्शन करने व अपने श्रद्धासुमन अर्पित करने आते हैं। सिखों ने गोविन्दघाट, घांघरिया (10000 फुट) व हेमकुण्ड (15000 फुट) में सुविधापूर्ण गुरुद्वारे स्थापित किये हैं। सिख गुरु-भक्तों की मान्यता है कि हेमकुण्ड में सिखों के दसवें गुरु गोविन्दसिंह ने पूर्वजन्म में तपस्या की थी तथा ‘‘खालसा-दर्शन’’ का सूत्रपात किया था जो आज सिखों का प्रमुख तीर्थ स्थान बन गया है। पवित्र सिख-ग्रंथ ‘विचित्र-नाटक’ में अंकित है:- ‘हेमकुण्ड पर्वत है जहां सप्त श्रृंग सोहत है वहां, तहां हम अधिक तपस्या साधी, महाकाल का अपराधी।’

पौराणिक एवं ऐतिहासिक स्थल लोकपाल (दंड पुष्करणी सरोवर) के समीप ही हिन्दुओं का भी एक प्राचीन लक्ष्मण मंदिर स्थित है। किंवदन्ती है कि इसी स्थान पर लक्ष्मण ने मेघनाद के वध के बाद तपस्या की थी। स्कन्दपुराण-केदारखण्ड में इसका वर्णन मिलता है। सन् 1988 में ‘‘मानव उत्थान सेवा संस्थान’’ के संस्थापक सतपाल महाराज की प्रेरणा से इस लक्ष्मण मंदिर के जीर्णोद्धार एवं प्रतिष्ठापना का पुनीत कार्य सम्पन्न हुआ है। विश्व में इतनी ऊंचाई पर स्थित सिखों व हिन्दुओं का अकेला तीर्थ हेमकुंड एवं लक्ष्मण मंदिर हिमानी लोकपाल सरोवर के समीप ही स्थित है। ये दोनों तीर्थ सिख तथा हिन्दू दोनों धर्मावलम्बियों के लिये दर्शनीय एवं पूजनीय संगम तीर्थ होने के साथ- साथ श्रद्धा एवं आस्था के प्रतीक भी हैं। यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारने प्रकृति-प्रेमी, पर्यटक एवं शोधकर्त्ता भी पर्याप्त संख्या में आने लगे हैं।

ऋषिकेश-बद्रीनाथ यात्रा मार्ग पर जोशीमठ से 24 किमी0 की दूरी पर पांडुकेश्वर के समीप अलकनन्दा के तट पर स्थित गोविन्दघाट (5100 फुट) से हेमकुण्ड की पैदल चढ़ाई युक्त यात्रा प्रारम्भ होती है। गोविन्दघाट से 10 किमी0 की दूरी पर भ्यूंडार गांव तथा उससे चार किमी0 आगे घांघरिया (10000 फुट) है। गोविन्दघाट तथा घांघरिया में वन विभाग, पर्यटन विभाग के तथा निजी संचालित विश्रामगृह तथा बड़े गुरुद्वारे हैं। यहां पर ग्रीष्मकाल के इन चार महीनों में हेमकुण्ड यात्राकाल में एक अच्छी-खासी बस्ती बन जाती है। यहां पर घोड़े, पालकी व श्रमिकों की व्यवस्था सुलभ है। घांघरिया में प्रत्येक यात्री को सुविधा की दृष्टि से एक रात्रि रुकना पड़ता है। यहां पर ऊंचाई पर चारों ओर पर्वतों पर छोटे-बड़े वृक्षों के पुंज हैं, मानो प्रकृति ने उन्हें अपने हाथ से संजोया हो। सामने नीलकंठ (21500 फुट) का भव्य शिखर है और पीछे ऐतिहासिक काकभुषुण्डी का ग्लेशियर दृष्टिगोचर होने लगता है।

घांघरिया से एक मार्ग बांयी तरफ भ्यूंडार गंगा के साथ ढाई किमी0 कि दूरी पर स्थित विश्वविख्यात फूलों की घाटी (12500 फुट) को जाता है। घांघरिया से दूसरा मार्ग भ्यूंडार गंगा को पारकर दांयी ओर साढ़े पांच किमी0 की दूरी पर कष्ट साध्य दुर्गम चढ़ाई युक्त मार्ग पर स्थित हेमकुण्ड पहुंचता है। इसका प्राचीन नाम लोकपाल है। यह हिमानी तीर्थ प्राकृतिक सौंदर्य के साथ धार्मिक आस्थाओं के साथ जुड़ा हुआ है। जनपद चमोली के सीमांत क्षेत्र जोशीमठ के जनजाति समुदाय के श्रद्धालु ग्रीष्मकाल के मुख्य पर्वों पर यहां अपने परम्परागत पावन लोकपाल तीर्थ में स्नान-पूजा- अर्चना करने तथा मनौती करने आते रहते हैं। अगस्त-सितम्बर में बर्फ पिघलने के बाद यहां के ग्लेशियरों के ढलानों तथा बुग्यालों (हरी घास के मैदानों) मेें अनेक भांति के दुर्गम पुष्प, दुर्गम जड़ी-बूटियां, ब्रह्म कमल, फेन कमल आदि उगे-खिले हुये दिखाई देते हैं।

हेमकुंड तीर्थस्थल की खोज सन् 1930 से प्रारम्भ हुई थी। सन् 1935-36 में यहां पर एक अस्थाई गुरुद्वारे की स्थापना हुई। श्रद्धालु सिख यात्रियों के निरन्तर आवागमन के कुछ वर्षों के बाद यहां पर एक विशाल दो मंजिले गुरुद्वारे का निर्माण किया गया जिसके विस्तार एवं सौंदर्यीकरण का कार्य निरन्तर चलता रहता है।

गढ़वाल हिमालय में स्थित हेमकुंड एवं प्राचीन ऐतिहाकसिक लोकपाल तीर्थ को सिख-हिन्दु धर्मावलम्बी अपना ‘‘कैलाश-मानसरोवर’’ मानते हैं। जिस भांति हिन्दुओं में:- ‘‘और तीर्थ सौ बार, गंगा सागर एक बार’’ वाली उक्ति प्रचलित है। उसी प्रकार सिखों में भी इस तीर्थ के संबंध में मान्यता है। हिमानी तीर्थ-लोकपाल की यात्रा ग्रीष्मकाल में पहली जून को प्रारम्भ होकर सितंबर अन्त तक चार माह तक चालू रहती है।

श्री राधाकृष्ण वैष्णव
श्री राधाकृष्ण वैष्णव, नन्दप्रयाग | स्वतंत्रता संग्राम पत्रकार | सात दशकीय पत्रकारिता/साहित्य लेखन

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