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Thursday, September 29, 2022
उत्तराखंड दर्पण बद्री-केदार की पौराणिक मान्यताएं

बद्री-केदार की पौराणिक मान्यताएं

प्राचीन समय में हिमालय के इन तीर्थ स्थानों की यात्रा इतनी कठिन एवं कष्टप्रद होती थी कि शायद कम ही व्यक्ति इन तीर्थों की यात्रा से सकुशल लौट आते हों। उस समय की कठिनाईयों एवं कष्टों का अनुभव आज के द्रुतगामी यातायात के साधनों के युग में लगाना कठिन है। शास्त्रों में देवात्मा-हिमालय को पांच खण्डों में विभक्त किया गया है। पहला खण्ड नेपाल, दूसरा खण्ड कूर्मांचल (कूमायूं क्षेत्र) है, तीसरा खण्ड जालन्धर है, जिसके अंतर्गत पंजाब का समस्त प्रांत है। चौथा खण्ड है जिसमें पंजाब से लेकर कश्मीर का समस्त भाग सम्मिलित है। इस खण्ड में शिवजी ‘अमरनाथ’ नाम से प्रसिद्ध हैं। पंाचवा खण्ड है- केदार। इसमें हरिद्वार से लेकर कैलाश पर्वत पर्यन्त जितनी भूमि है वह हिमालय का पावन क्षेत्र ‘केदारखण्ड’ माना जाता है। पौराणिक मतानुसार गढ़वाल केदारखण्ड के नाम से विख्यात है। चूंकि केदारखण्ड द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक लिंग है और इस देश का अधिपति माना जाता है, अतः इस भू-भाग का नाम ‘केदारखण्ड’ पड़ा।

केदारखण्ड शिवजी की क्रीड़ा-स्थली है। यहां सर्वत्र शिवजी का ही साम्राज्य है। उन्हीं के यक्ष, किन्नर, राक्षस, दानव, भूत-प्रेत आदि यहां सदा से निवास करते आये हैं। कहते हैं कि जब से विष्णु भगवान का इस क्षेत्र में पदार्पण हुआ तब से इस केदारखण्ड के अंतर्गत बदरिकाश्रम ‘वैष्णव-खण्ड’ भी परम-पावन तीर्थ बन गया। इसलिये धार्मिक परम्परानुसार श्रद्धालु यात्री पहले आदि केदारनाथ जी के दर्शन कर तब बद्रीनाथ जी के दर्शनों के निमित्त जाते हैं। गंगोत्री तथा यमुनोत्री की यात्रा संपन्न कर भी कई यात्री केदारनाथ पहुंचते हैं। केदारखण्ड के अंतर्गत सवा लाख पर्वतों में न जाने कितने तीर्थ व मंदिर छिपे पड़े हैं, यह पूरी तरह शास्त्र ही बता सकते हैं। बद्रीनाथ व केदारनाथ के दर्शन हो जाने पर सभी तीर्थ प्रसन्न हो जाते हैं। सभी उसकी यात्रा को मान्यता प्रदान करते हैं। इसके अलावा गंगोत्री, यमुनोत्री, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मद्महेश्वर आदि हिमानी तीर्थ भी विशेष रूप से वंदनीय हैं।

पौराणिक कथनानुसार इस तपोभूमि में सर्वप्रथम महात्मा उपमन्यु ने भगवान शंकर की आराधना की थी। द्वापर में जब पाण्डव हिमालय में केदारनाथ के दर्शनार्थ गये तो भगवान शंकर ने उन्हें ‘गोत्र-हत्या’ का दोषी जानकर स्वयं महिष रूपी शिला धारण कर पृथ्वी में प्रवेश करना चाहा। जैसे ही उनका अग्रभाग पृथ्वी के अंदर घुसने लगा तो तुरन्त भीम ने उन्हें पकड़ लिया। इस पर शंकर भगवान ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिये और उन्हें ‘गोत्र हत्या’ के श्राप से मुक्त कर दिया। उनका अग्रभाग नेपाल में पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। शेष पांच भागों में बाहें तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मद्महेश्वर में, जटा कल्पेश्वर में तथा पृष्ठ भाग केदारनाथ में प्रकट हुये। केदारनाथ सहित ये पांचों तीर्थ ‘पंच केदार’ के नाम से केदारनाथ व बद्रीनाथ की घाटी में पूजे जाते हैं। इन सब तीर्थों में केदारनाथ तीर्थ का विशेष महत्व है। शंकर जी का यह पृष्ठ भाग त्रिकोण विशाल पाषाण-शिला के रूप में केदारनाथ मंदिर में स्थित है, जिसके स्पर्श एवं पूजने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्ति पा जाता है, यह प्राचीन किंवदन्ती प्रसिद्ध है।

केदारनाथ की यात्रा अत्यंत पुण्यमयी है तथा केदारनाथ क्षेत्र देवताओं और ऋषि-मुनियों की तपस्या-स्थली है। एकान्तप्रिय भगवान शंकर की तपस्या-स्थली केदारनाथ के विषय में पुराणों में विषद वर्णन उपलब्ध है।

केदारनाथ मार्ग पर सोनप्रयाग से 8 किमी0 की दूरी पर मोटर मार्ग के पास ही प्रसिद्ध तीर्थ त्रियुगीनारायण स्थित है। पौराणिक कथनानुसार भगवान विष्णु की उपस्थिति में इस स्थान पर शिव-पार्वती का विवाह हुआ था। यहां पर नारायण के प्राचीन मंदिर मेें अखण्ड-ज्योति तथा तीन युगों से जलती आ रही अखण्ड-धुनि भी है। गौरीकुण्ड में एक गरम जल का कुण्ड है तथा समीप ही गौरी-मंदिर के नीचे रंग बदलता हुआ गुनगुने जल का एक छोटा कुण्ड भी है। किंवदन्ती है कि पार्वती जी ने विवाह के बाद यहीं पर सर्वप्रथम स्नान किया था। तपोभूमि बदरिकाश्रम के महत्व के संबंध में प्रायः सभी पुराणों में विवरण मिलता है। पुराणों में वर्णित देवताओं का निवास स्थल यहीं था। प्राचीन ऋषि-महर्षियों तथा पाण्डवों से लेकर आज तक के साधु-सन्तों, ज्ञानियों और मनीषियों ने यहीं पर तप किया। बदीनाथ के समीप राजा पाण्डु का आश्रम था जो आज पाण्डुकेश्वर के नाम से प्रचलित है।

बद्रीनाथ से कुछ आगे सीमान्त ग्राम माणा के पास ही व्यास-गुफा में ही महर्षि वेद-व्यास ने वेदों का संकलन-संपादन कर उन्हें चार खण्डों में विभाजित कर नाम प्रदान किये। अनेक पुराणों की रचना भी यहीं हुई। ऋषि-महर्षियों और वशिष्ट मुनि जैसे समादरणीय कुल-गुरुओं ने अपना शेष जीवन देवी-ज्ञान-सम्पादन की दृष्टि से यहीं व्यतीत किया। किंवदन्ती है कि भगवान राम ने भी वृद्धावस्था में अपनी तपस्या और साधना के दिन अलकनन्दा तथा भागीरथी के पावन तट पर स्थित देवप्रयाग तीर्थ में ही व्यतीत किये और उनके आगमन के स्मारक-स्वरूप वहां पर एक विशाल श्री रघुनाथ मंदिर का भी निर्माण किया गया था।

बदरीकाश्रम में ‘पंचकेदार’ की भांति ‘पंचबदरी’ नाम से पांच तीर्थ प्रसिद्ध हैं- आदिबदरी, बृद्धबदरी, विशाल बदरी, भविष्य बदरी तथा योगध्यान बदरी। इनकी स्थापना बौद्ध कालीन युग में हुई थी। शास्त्र पुराणों में सर्वश्रेष्ठ तपोभूमि ‘बदरिकाश्रम’ और चारों धामों में श्रेष्ठ धाम ‘बद्रीनाथ’ धाम है।

भगवान विष्णु ने स्वयं इस तपोभूमि में तपस्या की। एक बार नारद मुनि ने भगवान से पूछा कि ‘‘आप त्रिलोकीनाथ होते हुये भी इस वन में क्यों और किस हेतु तपस्या कर रहे हो ?’’ इस पर विष्णु भगवान ने मुस्कराते हुये उत्तर दिया ‘‘हे मुनिश्रेष्ठ! यह बदरिकाश्रम बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि एवं मेरे भक्तों की तपस्या-स्थली है, इसलिए यह भूमि मुझे अत्यंत प्रिय है और मैं प्रत्यक्ष रूप से इस बद्रीनाथ-धाम में निवास करता हूं।’’ भगवान के श्रीमुख से इस पुण्यभूमि की विशेषता सुनकर नारद मुनि तब से प्रायः इस बद्रीनाथ धाम में निवास करते हुये बद्री विशाल की पूजा अर्चना करने लगे।

बद्रीनाथ मंदिर देश की सांस्कृतिक एवं भावात्मक एकता, श्रद्धा तथा सम्मान का महत्वपूर्ण प्रतीक है। दक्षिण से आकर, स्वामी शंकराचार्य ने उत्तर में बद्रीनाथ की मूर्ति की स्थापना की और आज भी केरल राज्य के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण मुख्य पुजारी रावल ही मंदिर की पूजा-श्रृंगार के अधिकारी हैं। इस भांति पावन तीर्थ बद्रीनाथ राष्ट्रीय-एकता का भी प्रेरणा-श्रोत है और साथ ही भारतीय संस्कृति एवं साहित्य का उद्गम स्थल भी है।

श्री राधाकृष्ण वैष्णव
श्री राधाकृष्ण वैष्णव, नन्दप्रयाग | स्वतंत्रता संग्राम पत्रकार | सात दशकीय पत्रकारिता/साहित्य लेखन

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