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Wednesday, May 25, 2022
उत्तराखंड दर्पण उत्तरांचल में चकबन्दी का एकमात्र विकल्प

उत्तरांचल में चकबन्दी का एकमात्र विकल्प

उद्योग विहीन पहाड़ों में आजीविका के दो ही साधन हैं, खेती या नौकरी। कम्प्यूटर कृत वैश्वीकरण के इस युग में रोजगार पाने की सम्भावनायें तो दिन प्रतिदिन सीमित होती जा रही हैं और खेती पहाड़ में दो जून की रोटी मुहैया कराने के काबिल नहीं, ऐसे में गरीबी से त्रस्त जिन्दगी को विकास की बातें परी कथाओं सी लगती हैं। हमारी व्यवस्था, चाहे वह शैक्षिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो या राजनीतिक ऐसी हो चली है कि अब उस पर प्रश्नचिन्ह लगने लगें है, उंगलियां उठने लगी हैं। उत्तरांचल राज्य जहां 54,483 वर्ग कि0मी0 कुल क्षेत्रफल मध्ये 47,325 वर्ग कि0मी0 भूभाग पर्वतीय है जो राज्य का लगभग 88ः भूभाग है और जहां की कुल जनसंख्या 84 लाख 79 हजार 562 की लगभग 55ः आबादी पहाड़ों में खेती पर मुनस्सर हैं, वहां की भूमि के प्रबंधकीय महत्व को प्राथमिकता के आधार पर स्वीकारना राज्य सरकार के लिए अपरिहार्य  हो गया हैं। अपरिहार्य इसलिए भी है क्योंकि, राज्य में कृषि भूमि मात्र 6 लाख 90 हजार 808 हेक्टेयर अर्थात 12.75 प्रतिशत है। इस भूमि में सिचिंत भूमि मात्र छ या सात प्रतिशत अत्यन्त न्यून हैं। भौगोलिक दुरूहता, दूर-दूर छितरे पथरीले सीढ़ीनुमा खेत, जिनमें पहुंचने में आधी जिन्दगी समाप्त हो जाय। हल जोतने, फसल बोने निराई गुड़ाई, खाद-गोबर डालने व फसलों  की सुरक्षित  कटाई कितना दुरूह कार्य है इसकी वास्तविकता से वही लोग परिचित हैं जिन्होंने वहां का जीवन जिया हो, इसीलिए पहाड़ों में लगभग दो दशकों  से चकबन्दी की मांग जोरों  से उठती जा रही  हैं।

जब वर्तमान उत्तरांचल राज्य उत्तरप्रदेश का अंग था  तब योजना तत्कालीन जिला नैनीताल की तहसील किच्छा व खटीमा जो वर्तमान जनपद ऊधमसिंह नगर की तहसीलें हैं, में वर्ष 1986 -87 में लागू की गई थी और पहाड़ी जनपदों की सर्वेक्षण आख्या शासन को भेजी गई थी, जिस पर उ0प्र0 सरकार ने चकबन्दी क्रम के अध्ययन हेतु एक अध्ययन दल हिमाचल प्रदेश में भेजा था। जिसकी आख्या पर विचारोपरान्त पायलेट प्रोजक्ट के रूप में गढ़वाल तथा कुमाऊं मण्डलों में चकबन्दी के प्रचार प्रसार हेतु एक-एक चकबन्दी अधिकारी  पौड़ी एवं अल्मोड़ा  के जनपदों में नियुक्त किये गये थे। चकबन्दी  का प्रसार ‘वाटर सेट’ के आधार पर करने के निर्देश दिए गये थे जिसमें ऊंचाई का कोई प्रतिबन्ध नहीं था। दोनों  मण्डलों  के लिए उप निदेशक चकबन्दी  का पद भी कुछ वर्षो  तक सृजित रहा परन्तु 14 वर्षो की काल अवधि में जनपद पौड़ी व अल्मोड़ा के किसी भी गांव में चकबन्दी योजना को कार्यरूप दिया गया हो, ऐसा नहीं लगता। चकबन्दी स्टाफ से वार्ता करने पर विदित हुआ पहाड़ के लोग गांव में चकबन्दी नही कराना चाहते हैं इसलिए यहां चकबन्दी सम्भव नही हैं। इससे उलट भाई गणेशसिंह ‘गरीब’, विकासखण्ड कल्जीखाल, जनपद पौड़ी गढ़वाल, में चकबन्दी अभियान जोर-शोर से चला रहे हैं और समाचार पत्रों से ज्ञात हुआ है कि उन्होंने तमाम ग्रामीण इलाकों में गांव वालों की ‘चकबन्दी कमेटियों’ का गठन भी  कर लिया है। परन्तु क्या पहाड़ी कृषि भूमि में चकबन्दी योजना लागू करना सम्भव है ? इस पर उ0प्र0 चकबन्दी अधिनियम 1953 के प्रावधानों पर विचार किया जाना आवश्यक है, क्योंकि उत्तरांचल सरकार अभी भूमि व्यवस्था सम्बन्धी अपने कानून नही बना पायी हैं। अतः उ0प्र0 के भूमि व्यवस्था सम्बन्धी कानून ही उत्तरांचल पर लागू हैं।

उ0प्र0 चकबन्दी अधिनियम की धारा 9 सी (1) में यह प्राविधान है कि सहायक चकबन्दी अधिकारी या चकबन्दी अधिकारी अधिनियम की धारा 9-ए के अन्तर्गत संयुक्त खातों की भूमि का विभाजन कर सकता हैं। उत्तराखण्ड के लगभग 75 प्रतिशत खातेदारों के पास बीस नाली (एक एकड़) से भी कम  भूमि है जो छोटे-छोटे सीढ़ीदार खेतों के रूप में दूर-दूर छितरी हुई है जिसे इकजाई कर चक बनाने में इसलिए दिक्कत आएगी क्यांेकि खातेदार अपने सिचिंत खेंतो (सेरा) को तथा घरों के पास के सगवाड़ों  को छोड़ने को जल्दी से तैयार नहीं होते और इस प्रकार चकबन्दी को व्यवहारिक रूप देने में अड़चनें महसूस की गई हैं। योजना के व्यावहारिक पक्ष को कार्यान्वित करने में इसलिए भी दिक्कतें महसूस हो रही है क्योंकि जो चक बनेगें वह बीस नाली या उससे भी कम भूमि की जोतें होगी जो लाभकारी सिद्ध नहीं हो सकते। उ0प्र0 में 3.25 एकड़ अर्थात 62.5 नाली या इससे कम जोतेां को तथा हिमाचंल प्रदेश में 2.5 एकड़ अर्थात् 50 नाली से कम जोतों को अलाभकारी माना गया है। ऐसी दशा में चकबन्दी का एकमात्र विकल्प सहकारी कृषि व्यवस्था ही है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के विचार थे कि, “जब तक हम सहकारी कृषि को नहीं अपनाते हम भूमि से उपज का पूरा लाभ प्राप्त नहीं कर सकते हैं।” देश में कम उपज का कारण भी छोटी-छोटी अलाभकारी जोतें ;ीवसकपदहद्ध रही है जो कुल कृषि भूमि के लगभग 75 प्रतिशत  है। जब तक कृषि जोतों का विस्तार नहीं होता तब तक हम न तो उत्पादन में वृद्धि  की अपेक्षा कर सकते हैं और न उद्योगों  के लिए कृषि आधारित कच्चा माल ही उपलब्ध करा सकते हैं। कृषि जोतों के विस्तारीकरण के अन्य तरीके भी हैं यथा राज्य द्वारा संचालित स्टेट फार्मिग, पूजींपतियों को अन्न या अन्य उपज बढाने  हेतु भूमि दी जाय या सामूहिक खेती जैसे उद्यम, लेकिन इन सबसे उत्तम विधि ‘सहकारी कृषि फार्म’ ही हैं क्यांेकि इस व्यवस्था के अन्तर्गत जहां एक ओर खेती पर काश्तकार के भौमिक अधिकार यथावत् कायम रहते हैं वहीं उसे बड़े पैमाने पर होने वाली खेती के लाभ भी सुलभ हो जाते हैं।

नवगठित उत्तरांचल राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में, जहां  के लोग ‘जल,जंगल और जमीन’ के लिए जूझते रहते हैं और जहां कृषि भूमि का क्षेत्रफल मात्र 10 प्रतिशत रह गया है तथा लगभग 95 प्रतिशत कृषि खाते 0.04 हेक्टेअर अर्थात् 18 नाली से भी कम हैं,  सहकारी कृषि  ही आर्थिक उन्नति का एकमात्र आधार हैं। सहकारी खेती का स्वरूप क्या होता है इसे समझना भी अति आवश्यक है ताकि आम काश्तकार इसके होने वाले फायदों से भली-भांति परिचित हो सके। सहकारी खेती के लिए सहकारी कृषि फार्म की स्थापना करना परम आवश्यक है। इसके गठन हेतु गांव सभा के ऐसे दस या अधिक सदस्य, जिनके पास सब मिलाकर बारह हेक्टेअर अर्थात् छः सौ नाली या उससे अधिक भूमि में भूमिधरी के या आसामी के अधिकार हों और जो सहकारी कृषि फार्म खोलना चाहते हों, सहकारी समिति अधिनियम 1912 के प्रावधानों के अन्तर्गत निबंधक(रजिस्ट्रार) को निबंधन के लिए धारा 297 के अधीन प्रार्थना पत्र दे सकते  हैं। इस प्रार्थनापत्र में भूमि अधिकारों के उद्धरण सहित सभी इच्छुक काश्तकारों की गाटा संख्या तथा उनका क्षेत्रफल दर्शाया जायेगा तथा अन्य ब्यौरे भी जो प्रार्थनापत्र में देने आवश्यक हों, प्रस्तुत करने होगें। निबंधक द्वारा नियत जांच के पश्चात् सन्तुष्ट होने की स्थिति में ऐसे ‘सहकारी फार्म’ का निबंधन करने पर तत्सम्बंधी प्रमाण पत्र जारी करने का प्रावधान कोआपरेटिव सोसायटीज ऐक्ट 2 सन् 1912 में हैं। प्रमाण पत्र की एक प्रति निबंधक सहकारी समितियां, संबन्धित जिलाधिकारी को ऐसी कार्यवाही के लिए भिजवायेगा जो नियत की जाय। निबंधन के पश्चात् सहकारी फार्म में शामिल होने वाले सभी खातेधारों की भूमि उस सहकारी फार्म में अन्तरित होकर उसके कब्जे  में समझी जायेगी और उसके बाद से वह भूमि, उस सहकारी कृषि फार्म के पास रहेगी और वह फार्म तत्पश्चात् अधिनियम की धारा 146 में उल्लिखित सभी प्रयोजनों के लिए या कुटीर उद्योग ;ब्वजजंहम प्दकनेजतपमेद्ध के विकास के लिए उपयोग में लाया जा सकता हैं।

अलाभकारी खातों के दो तिहाई खातेदार, जिनकी भूमि का क्षेत्रफल उस मण्डल के कुल खातों के क्षेत्रफल का कम से कम दो तिहाई हो, भी, सहकारी समितियां अधिनियम की धारा 299 के अन्तर्गत अपने जिले के कलेक्टर को संयुक्त रूप से प्रार्थनापत्र दे सकते है कि उनका एक सहकारी फार्म स्थापित किया  जाय। कलेक्टर ऐसे प्रार्थनापत्र का संज्ञान लेते हुए तथा अधिनियम की धारा 300 व 301 के अन्तर्गत कार्यवाही करते हुए निबंधक से सहकारी फार्म का निबंधन धारा 303 के अन्तर्गत करा सकते हैं। सहकारी कृषि फार्म का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे भूमि की चकबन्दी कराने का और कोई अच्छा विकल्प नहीं है।

सहकारी फार्म बनाने से लाभ:-

  1. प्रत्येक सहकारी कृषि समिति का यह दायित्व हो जाता है कि वह अपने परगने के सहायक कलेक्टर/उप जिलाधिकारी को प्रार्थनापत्र देकर अपने द्वारा चयनित भूमि की चकबन्दी करा सकती है।
  2. सिंचाई कर, स्थानीय निकायों द्वारा लगाये गये कर तथा कृषि प्रयोजनों के लिए डीजल, पेट्रोल तथा मोबिल आयल के क्रय पर बिक्री कर में कमी के लिए राज्य सरकार से अनुरोध कर सकती है।
  3. तकावी मिलने में भी सहकारी कृषि समितियों को प्राथमिकता दिए जाने का प्रावधान है।
  4. राज्य सरकार द्वारा सिंचाई के लिए जल सम्भरण तथा अन्य परियोजनाओं  के निर्माण में प्राथमिकता का भी प्रावधान है।
  5. बीज, खाद, उर्वरक तथा कृषि उत्पादन की अन्य आवश्यक वस्तुओं के सम्भरण में प्राथमिकता राज्य सरकार द्वारा दी जा सकती है।
  6. कृषि उपज के क्रय-विक्रय (मार्केटिगं) में प्राथमिकता  हेतु राज्य सरकार नियम बनाकर व्यवस्था कर सकती है।
  7. मालगुजारी में कमी का भी प्रावधान है।
  8. सरकार द्वारा नियुक्त विशेषज्ञों से निःशुल्क वैशेषिक परामर्श (फ्री टैक्नीकल ऐडवाइस) भी सरकार द्वारा उपलब्ध कराया जाता है।
  9. ब्याज पर या बिना ब्याज के वित्तीय सहायता, सहायक अनुदान तथा ऋण ;थ्पदंदबपंस  ।पकए हतंदज  व ि ेनइेपकल ।दक स्वंदद्ध की व्यवस्था भी राज्य सरकार  से अनुरोध करने पर सुनिश्चित की जा सकती है।
  10. गांव सभा से काश्तकारी के लिए भूमि उपलब्ध होने की दशा में लीज पर भूमि ली जा सकती है।
  11. इस व्यवस्था से ओडों, मेडों के आपसी झगड़े समाप्त हो जायंेगे।
  12. जो कृषि योग्य भूमि गावांे में किन्ही कारणों से बंजर पड़ी हैं उनका कृषि उत्पादन हेतु उपयोग हो जायेगा।
  13. गांव के बेरोजगारों को काम मिलेगा, अच्छी मजदूरी व बोनस का लाभ पाने की उम्मीद होगी।
  14. मूलभूत सुविधाओं यथा बैलों, कृषि यंत्रो तथा सिंचाई,पूंजी सुविधाओं ;ब्ंचपजंस   त्मेवनतबमेद्ध का सही उपयोग होगा।
  15. सहकारी कृषि फार्म में वैज्ञानिक पद्धति से फसलें तैयार की जा सकती है ;ब्तवच च्संददपदहद्ध तथा  पैदावार  भी बढ़ाई  जा सकती है।
  16. सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से भी सहकारिता के आधार पर खेती करना लाभदायक है। समिति द्वारा काश्तकारों को चिकित्सा, शैक्षिक व आवासीय बेहतर सुविधायें सुनिश्चित  की जा सकती हैं।
  17. पहाड़  में पहले सही साझें  में खेती करने की प्रथा रही है जिसमें सारें गांव के लोग या खोला या तोक के काश्तकार मिलजुल कर पौध लगाने, निराई-गुड़ाई तथा फसल कटाई व मंडाई का काम करते थे। जब तक पहाड़ में सामूहिक परिवार या संयुक्त परिवारों की प्रथा थी, खेती अच्छी होती थी। जब से एकल परिवार की प्रथा विकसित हुई है खेती चौपट हो गई है।
  18. भूमि का बंटवारा ;क्पअपेपवद – नइ  कपअपेपवदद्ध तथा खेतों के टुकड़े ;थ्तंहउमदजंजपवदद्ध होने से बच जाता है तथा सारे छितरे हुए अलग-अलग टुकड़ो में बंटे एकजाई रूप में कृषि प्रयोग में आ जाते हैं।
  19. सहकारी कृषि फार्म में जिन लोगों की भूमि शामिल की जाती हैं वह ही मजदूरी कर सकते हैं जिसके लिए उन्हें मजदूरी का भुगतान किया जाता है। कृषि से होने वाला लाभ सभी काश्तकारों के मध्य उनकी भूमि के क्षेत्रफल के अनुपात से वितरित किया जाता है। मजदूरी के अनुपात में लाभ की दशा में मजदूरों या काश्तकार, जो खेत में काम करते हैं, को बोनस भी दिया जाता है।

चंूकि भूमि व्यवस्था तथा भूमि विधि राज्य का अधिकार क्षेत्र है, अतः उत्तरांचल सरकार को सहकारी कृषि व्यवस्था पर्वतीय ग्रामों में लागू करने की पहल करनी होगी। इसके लिए पहाड़ों की भौगोलिक संरचना के अनुरूप तथा खेतों की स्थिति के अनुसार नियम बनाने हांेगे,  तथा नये सिरे से कृषि नीति तैयार करनी होगी। सहकारी खेती को प्रोत्साहन देने के लिए निःशुल्क वैशेषिक परामर्श ;थ्तमम ज्मबीदपबंस  ।कअपबमद्ध, कम ब्याज पर या बिना ब्याज पर वित्तीय सहायता, सहायक अनुदान, अलाभकर जोत वाली  समितियों  को अतिरिक्त कृषि योग्य भूमि का आवंटन, सरकारी सिंचाई  की व्यवस्था यथा बारिस के पानी के सम्भरण व खेतों तक पानी पहुंचाने हेतु उपक्रम, अच्छे बीज तथा कीटनाशक दवाओं की उपलब्धि, फसलों के विपणन, सम्भरण, संचरण आदि की व्यवस्था करनी होगी। जानवरों के लिए अच्छी घास, चारा वनों में उगाने की वैकल्पिक व्यवस्था तथा खाना पकाने के लिए गैस एवम् मिट्टी तेल उपलब्ध कराने व हर गांव को सड़कांे से जोड़ने की व्यवस्था भी करनी होगी तभी उत्तराखण्ड का आर्थिक विकास सम्भव हैं। ग्राम्य विकास की कल्पना भी तभी साकार होने की आशा बलवती हो सकती है।

श्री राधाकृष्ण वैष्णव
श्री राधाकृष्ण वैष्णव, नन्दप्रयाग | स्वतंत्रता संग्राम पत्रकार | सात दशकीय पत्रकारिता/साहित्य लेखन

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